महानता के मानक-2

सम्पत्ति, शक्ति, यश, सौन्दर्य, ज्ञान और त्याग।

ये 6 विशेषतायें न केवल आपको आकर्षित करती हैं वरन देश, समाज, सभ्यतायें और आधुनिक कम्पनियाँ भी इनके घेरे में हैं। यही घेरा मेरी चिन्तन प्रक्रिया को एक सप्ताह से लपेटे हुये हैं।

सम्प्रति शान्तिकाल है, धन की महत्ता है। आज सारी नदियाँ धन के सागर में समाहित होती हैं। एक गुण से आप दूसरा भी प्राप्त कर सकते हैं। मार्केट अर्थ व्यवस्था में सब आपस में इतना घुलमिल गये हैं कि पता ही नहीं लगता कि कब शक्तिशाली सांसद करोड़पति हो गये, कब यश पाये अभिनेता ज्ञानी हो गये, कब धन समेटने वाले यशस्वी हो गये, कब ज्ञानी अपनी योग्यता से कुबेर हो गये और कब त्यागी महात्मा वैभवशाली मठाधीश बन गये?

कृष्ण को पूर्णता का अर्पण दे, हम तो अपना परलोक सुधारते हुये कट लिये थे पर ये 6 देव घुमड़ घुमड़ चिन्तन गीला किये रहे।

ये कितनी मात्रा में हों, जिससे महान बन जायें? एक हों या अनेक? और क्या चाहिये महान बनने के लिये?

इतिहास खंगाल लिया पर कोई ऐसा महान न मिला जो इनमे से कोई भी विशेषता न रखता हो। ऐसे बहुत मिले जिनमे ये विशेषतायें प्रचुरता में थीं पर वे मृत्यु के बाद भुला दिये गये।

महानता की क्या कोई आयु होती है? क्या कुछ की महानता समय के साथ क्षीण नहीं होती है? ऐसा क्या था महान व्यक्तियों में जो उनके आकर्षण को स्थायी रख पाया?

अब इतने प्रश्न सरसरा के कपाल में घुस जायें, तो क्या आप ठीक से सो पाइयेगा? जब सपने में टाइगर वुड्स सिकन्दर को बंगलोर का गोल्फ क्लब घुमाते दिखायी पड़ गये तब निश्चय कर लिया कि इन दोनों को लॉजिकली कॉन्क्ल्यूड करना (निपटाना) पड़ेगा।

tiger-woods प्राचीन समय में महानता के क्षेत्र में शक्ति का बोलबाला रहा। एकत्र की सेना और निकल पड़े जगत जीतने और बन गये महान। उनके हाथों में इतिहास को प्रभावित करने की क्षमता थी, भूगोल को भी। धर्मों के उदय के संदर्भ में त्याग और ज्ञान ने महापुरुषों की उत्पत्ति की। विज्ञान के विकास में ज्ञान ने महान व्यक्तित्वों को प्रस्तुत किया। इस बीच कई चरणों में शान्ति के विराम आये जिसमें यश, सौन्दर्य और सम्पत्ति को भी महानता में अपना भाग मिला।

यह पोस्ट श्री प्रवीण पाण्डेय की “महानता के मानक” पर दूसरी अतिथि पोस्ट है। प्रवीण बेंगळुरू रेल मण्डल के वरिष्ठ मण्डल वाणिज्य प्रबन्धक हैं।

सम्प्रति शान्तिकाल है, धन की महत्ता है। आज सारी नदियाँ धन के सागर में समाहित होती हैं। एक गुण से आप दूसरा भी प्राप्त कर सकते हैं। मार्केट अर्थ व्यवस्था में सब आपस में इतना घुलमिल गये हैं कि पता ही नहीं लगता कि कब शक्तिशाली सांसद करोड़पति हो गये, कब यश पाये अभिनेता ज्ञानी हो गये, कब धन समेटने वाले यशस्वी हो गये, कब ज्ञानी अपनी योग्यता से कुबेर हो गये और कब त्यागी महात्मा वैभवशाली मठाधीश बन गये? दुनिया के प्रथम 100 प्रभावशाली व्यक्तित्वों में 90 धनाड्य हैं। बड़ी बड़ी कम्पनियाँ कई राष्ट्रों की राजनैतिक दिशा बदलने की क्षमता रखती हैं। लोकतन्त्र के सारे रास्तों पर लोग केवल धन बटोरते दिखायी पड़ते हैं।

यदि धन की यह महत्ता है तो क्या महानता का रास्ता नोटों की माला से ही होकर जायेगा?

क्या यही महानता के मानक हैं?

अवसर मिलने पर जिन्होने अपनी विशेषताओं का उपयोग समाज को एक निश्चित दिशा देने में किया वे महान हो गये। महान होने के बाद भी जो उसी दिशा में चलते रहे, उनकी महानता भी स्थायी हो गयी।

आज अवसर का कोई अभाव नहीं है। इन 6 विशेषताओं को धारण करने वाले कहाँ सो रहे हैं?


About Gyandutt Pandey

I am managing Train Movement on North Eastern Zone of Indian Railways. Blog: halchal.org Facebook & Twitter IDs: gyandutt
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56 Responses to महानता के मानक-2

  1. सोने की जगह तलाश कर उन्हें जगाते हैं।

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    • आप जगे हैं । निश्चय ही बहुत लोग आप से प्रेरणा पा रहे हैं और पाते रहेंगे । कई ऊर्जान्वित व्यक्तित्व अपना जीवन झोंके हुये हैं उन कारणों में जो आज आनश्यक हैं पर संसाधनों की नदी को अपना रास्ता बदल जिस दिशा में जाता देखता हूँ, वहाँ लोलुपता का ज्वालामुखी फूटा हुआ है । सब उड़ वाष्पित हो जायेंगे, संसाधन भी, जीवन भी ।

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  2. गुड मार्निंग…सच पूछा, कहाँ सो रहे हैं? उपर कमरे में सोया था मगर अब जाग गया हूँ.

    भगवन!! इस चिन्तन की ओर आपको किसने ढकेला? क्या वजह हुई कि आप इससे आकर्षित हुए.

    मैने सुना था कि आप महान होते नहीं, आपको महान बनाया जाता है, अतः यह क्रिया दूसरे करते हैं. आपको बस लॉबिंग करनी होती है. बाकी ६ गुण आपकी लॉबी वाले आपमें सिद्ध कर देंगे और आप महान हो जायेगे.

    मगर यह तो सुनी सुनाई बात है, कौन जाने कितनी सफल!! जो करके देखे, वो जाने!

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    • ऊपर के कमरे में जाग कर अब आप बाहर का बेहतर दृश्य देख रहे होंगे । हमें भी उस ऊँचाई पर ले चलें ।
      आपकी पोस्टें पढ़कर कभी न चिन्तन करने वाला भी चिन्तन में लग जायेगा । हम तो एक झटके में सारी पढ़ गये थे ।
      लॉबी वालों की भी प्रतिष्ठा आज दाँव पर लगी है । कई तो रोज नप रहे हैं । वैसे चढ़ते सूरज का गुणगान अवसर का पूर्ण संदोहन है ।

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  3. arvind mishra says:

    सर्वे गुणा कांचन माश्रयंती ! कृष्ण का पूर्ण अवतार ! चूंकि ये आज भी याद किये जाते हैं तो यह महानता का एक मापदंड तो हुआ ! पर याद क्यूं किये जाते हैं ? इसका निर्धारण जरूरी है —–और सब जानते हैं -दसियों कारण हैं -सबसे प्रमुख है उनकी लोकगम्यता!

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    • महानता के लिये किसी एक आकर्षण की डोर ही पर्याप्त है । यदि आपके कार्यों से आपका यश फैलता है तो भी आपको उत्साहवर्धन के साथ साथ एक मंच मिल जाता है कुछ और कर दिखाने का । कईयों ने यह रास्ता अपनाया है । धनाड्य होने के बाद लोग समाज सेवा के कार्यों में कदाचित इसीलिये ही लगते होंगे ।
      कृष्ण का चरित्र तो शोध का विषय है । निष्कर्ष हैं पर कारण समझ नहीं आते । गीता के शब्दों में गूढ़ रहस्यों की खोज मनीषी सदियों से कर रहे हैं ।

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  4. vani geet says:

    ऐसे महान जो होते हैं ….खामोश रहते हैं …
    इसलिए उन्हें इतना प्रचार प्रसार नहीं मिलता …वे अपने मौन में ही संतुष्ट होते हैं …
    अगर बोलते भी हैं तो नक्कारखाने में तूती की आवाज़ कौन सुनना चाहता है …इसलिए सोये पड़े रहते हैं

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    • सच कहा । पर क्या उन उत्कृष्ट जनों को ढोल बजाना भी सीखना पड़ेगा ? हमें अपनी दृष्टि के दोष का भान कब होगा ? ऐसा नहीं है कि हम कुछ देख नहीं पा रहे हैं पर जो देखते हैं और हृदय से मानते हैं उसे मान नहीं पा रहे हैं । महानता के मानकों को स्थापित करने का प्रयास उसी व्यग्रता की अभिव्यक्ति होगी ।

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  5. Nishant says:

    भगवान् कृष्ण के अतिरिक्त आप किस मनुष्य में यह छः गुण खोज पाएंगे? भगवान् राम में? मुझे यह संभव नहीं लगता.
    गाँधी महान थे लेकिन संपत्ति और सौंदर्य उनमें न था. अब आप संपत्ति और सौन्दर्य की फिगरेटिव व्याख्या न करने लगें. संपत्ति उन्होंने न तो अर्जित की और न ही संचित की. सौन्दर्य को भी वे बुढ़ापे में ही उपलब्ध हुए. उनकी युवावस्था की फोटो में वे सुन्दर प्रतीत नहीं होते.
    “अवसर मिलने पर जिन्होने अपनी विशेषताओं का उपयोग समाज को एक निश्चित दिशा देने में किया वे महान हो गये। महान होने के बाद भी जो उसी दिशा में चलते रहे, उनकी महानता भी स्थायी हो गयी।” – सत्य वचन.

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    • निशान्त, मुझे लगता है कि महानता के पथ पर एक व्यक्ति के अन्दर सारे 6 गुण होना आवश्यक नहीं । कृष्ण तो इन गुणों की पराकाष्ठा हैं, सभवतः इसीलिये नदंन कानन में वंशी की स्वर लहरी गुंजायमान कर सकते हैं या युद्धक्षेत्र में अर्जुन के व्यग्र चिन्तन पर मुस्करा सकते हैं ।
      आकर्षण पहले आता है । उसके पहले हमें कोई जानता ही नहीं । अपने उद्योग या परिश्रम से यश प्राप्त करने का प्रयास सभी कर सकते हैं ।
      दक्षिण अफ्रीका ने गाँधी को यश प्रदान किया पर गाँधी का त्याग ही उनका महागुण था । भारतीय जनमानस त्याग को आदर से देखता आया है । यही उनके समर्थन व शक्ति का कारण था । अंग्रेजों के कुटिलव्यूह में उलझ जाना उनकी महानता का अन्त हो सकता था पर उनके त्याग और पारदर्शी जीवनचर्या उन्हें महानता पर बहुत आगे तक ले गये ।

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      • MOHAN says:

        प्रवीण और निशान्त
        दोनों से ही सम्बोधित!
        कृष्ण की महानता आकर्षण का विषय भी है और पूर्ण मापदण्ड भी। इन गुणों में से सबका होना ज़रूरी नहीं, किसी एक की मात्रा भी महानता को प्राप्त कर सकती है। किसी एक गुण के बढ़ने पर अन्य में भी सहज ही विकास होता है, यह सब बातें तो हैं पर ध्यान देने की बात यह भी है कि क्या इन गुणों के ह्रास को इनका ॠणात्मक विकास नहीं समझना चाहिए?
        क्या ह्रास की पराकाष्ठा को ॠणात्मक महानता का विकास नहीं समझना चाहिए?
        मेरी समझ में नहीं। मेरा तर्क है कि यह महानता का संबन्ध संभवत: संबन्धित गुणों के वर्ग के समानुपाती हो… यानी एट्रिब्यूट चाहे नेगेटिव दिशा में ही क्यों न बढ़े, महानता तब भी बढ़ेगी ही। क्या ओसामा, दाऊद, या मर्लिन मुनरो को भूल सकते हैं महान और महत्वपूर्ण लोगों की सूची में? भले ही वे सब-सदा स्तुत्य न हों, अनुकरणीय न हों, कदाचित् हेय हों, अनुमेय न हों, पर उन्हें इग्नोर नहीं किया जा सकता।

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      • इन 6 गुणों के होने पर भी कोई महान क्यों नहीं है, इसका चिन्तन अगली पोस्ट का विषय है । सस्पेन्स रहने दिया जाये । पर हाँ आप ऋणात्मकता को अनदेखा नहीं कर सकते हैं । उनका शमन या दमन महानता का विषय हो सकता है ।

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      • Nishant says:

        “The character of greatness must be measured in two ways, else the measurement is flawed. First, and by far most popular of all, is by one’s ability to succeed in times of trial where others may fail. But of no less importance, and perhaps foundational to any form of greatness, is one’s willingness to start over in spite of failure, when success seems farthest away.” – Guy Finley

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      • शब्दशः सत्य है यह कथन । एक प्रयास में भेंटस्वरूप सफलता बिरलों को ही मिलती है । अर्जित करे में महानता की परीक्षा हो जाती है ।

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  6. गीता का अंतिम श्लोक अंश

    श्रीर्विजयोभूतिर्ध्रुवानीति: – सौन्दर्य, विजय, धन सम्पदा, निश्चित नीति…
    बड़ा आदर्श है।
    लेकिन उससे भी बड़ा सच है –
    यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः ।
    स एव वक्ता स च दर्शनीयः सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति ।।
    “जिसके पास धन है वही कुलीन, वही विद्वान, वही वेदज्ञ, वही गुणी है. वही वक्ता है और वही सुदर्शन भी. सारे गुण कंचन (सोना, यहाँ धन के लिए व्यवहृत) में आश्रय पाते हैं.”।
    भर्तृहरि ने सम्भवत: झुँझलाहट में कहा हो लेकिन यही नग्न यथार्थ है।
    अपनी एक पोस्ट याद आ गई। http://girijeshrao.blogspot.com/2009/04/2.html

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    • सच है । चाणक्य भी कहते हैं कि अर्थ धर्म की रक्षा करता है । भृर्तहरि ने संभवतः भविष्यवाणी की हो, आज की स्थितियों से तो यही लगता है । सबको यह श्लोक भी पता लग गया है । सब धन की ओर भाग रहे हैं । यदि रक्षक स्वामीत्व ग्रहण कर लें तो गुण सेवा में लग जायेंगे ।

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    • MOHAN says:

      नहीं!
      न यह यथार्थ है, न सत्य। यह केवल युगान्तर के अंतर्गत आज के मापदण्ड हैं। धन से गुणों को क्रय किया जा सकने की शक्ति पर प्रश्न नहीं, मगर आस्था के विगलन का प्रश्न अवश्य है।
      यह उत्तर और प्रश्न दोनों ही, वास्तव में इतना ही बताते हैं जो मैं अक्सर कहता हूँ कि
      “ईमानदारी एक ऐसी विलासिता है जो सबकी पहुँच में नहीं है”
      “Honesty is a luxury which everyone can not afford”
      यह उक्ति मेरी ही है और वर्तमान परिस्थितियों को देखते, समझते भी पैतृक (और मातृक भी)संस्कारों से उबर कर न सुधर पाने की आत्मग्लानि से उपजी हुई है। मैं इसी के साथ अर्थ के प्रति मोह – किसी भी कीमत पर रखने वालों को सहज स्वीकारने का मार्ग भी पा लेता हूँ, कि “ये बेचारे इस विलासिता को अफ़ोर्ड नहीं कर पा रहे” और इस के सहारे आत्मतुष्टि पा लेता हूँ।
      इसे आप मेरा दुराग्रह, पूर्वाग्रह भी कह सकते हैं मगर बात सिर्फ़ ईमानदारी की ही नहीं है, बात है ‘अर्थ’ को सर्वोपरि रखने की।
      इस यथार्थ को कि “सर्वे गुणा: काञ्चनम् न आश्रयन्ति” वही समझ पाते हैं जो अर्थ को उपलब्ध हो जाते हैं, यथेच्छ मात्रा में। मैंने छोड़ कर देखा है और प्रवीण! आप की त्याग वाली बात पर अभी तक नहीं बोला था, मगर इस उक्ति से सहमत होकर आप अपनी आस्था को ही नकार मत दीजिए। मैं जानता हूं कि व्यक्तिगत तौर पर आप कितना “न सुधर पाने वाले और अर्थसत्ता को सर्वोपरि न मान पाने वाले” व्यक्ति हैं। :)

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      • “ईमानदारी एक ऐसी विलासिता है जो सबकी पहुँच में नहीं है”
        “Honesty is a luxury which everyone can not afford”

        नशा चढ़ा दिया चिन्तन में । एक पूरा विवरण और पोस्ट बनता है इस पर ।

        वो कहते, मैं सुधर नहीं सकता, नहीं वो जान पाये हैं,
        जिन्दगी बेलुफ्त बिता आता, गर बिगड़ना नहीं आता ।

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  7. वर्डप्रेस का टिप्पणी तंत्र ठीक नहीं है। कोई भी मेरा नाम, ई मेल आइ डी और ब्लॉग पता भर कर मेरे नाम से टिप्पणी कर सकता है।
    बाद में आइ पी का पता लगा कर झुनझुना बजाते रहें लेकिन कारस्तानी तो हो ही गई।

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    • Gyandutt Pandey says:

      इस दशा से बचने के लिये शायद जरूरी हो कि Users must be registered and logged in to comment वाला विकल्प पाठक के लिये रखा जाये। पर वह छन्ना बहुत बारीक हो जायेगा, और बहुत से पाठक दूर से ही राम राम कर लेंगे। लिहाजा यही चलने दिया जाये।

      इस तरह की कारस्तानी ब्लॉगस्पॉट में भी मित्रगण मजे से कर सकते हैं।

      सब इस पर निर्भर करता है कि छद्म भाई में गरियाने की तलब कितनी तेज है! :)

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    • Nishant says:

      कमेन्ट कर भी देगा तो मॉडरेशन की छन्नी तो लगी ही है. सुधी मॉडरेटर देखते ही समझ जायेंगे कि किया गया कमेन्ट जेनुइन प्रतीत नहीं होता.
      ब्लौगर में केवल ब्लौगर अकाउंट/पासवर्ड द्वारा और ओपन आईडी के विकल्प अकाट्य हैं लेकिन कई छद्म ब्लौगरों ने नकली प्रोफाइल भी तो बना रखे हैं.
      वर्डप्रेस में कमेन्ट को सम्पादित भी किया जा सकता है. किसी जेनुइन कमेन्ट तो मनवांछित अर्थ भी दिया जा सकता है. ब्लौगर में आप कमेन्ट को केवल अप्रूव या डिलीट ही कर सकते हैं.

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  8. zeal says:

    Gyandutt ji–

    Kindly put a smiling pic in your profile. ( Just a humble request).

    I love to see people smiling !

    Smiles…

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  9. Shiv says:

    बहुत गज़ब पोस्ट है. इस चिंतन के लिए आपको साधुवाद और बधाई.

    वैसे आप यह कह सकते हैं कि लोकतंत्र महान है. जो;

    शक्तिशाली सांसद को करोड़पति बनाता है, यश पाये अभिनेता को ज्ञानी, धन समेटने वाले को यशस्वी, ज्ञानी को कुबेर और त्यागी महात्मा को वैभवशाली मठाधीश. मज़े की बात यह कि लोकतंत्र में इन ६ में से शायद ही कोई गुण मिले फिर भी मेरा भारत महान तो है ही.

    हिंदी के लेखक लिख सकते हैं कि “महात्मा गाँधी अद्वितीय रूप से सुन्दर थे. चेहरे की झुर्रियों ने उन्हें और सुन्दर बना दिया था.”

    आखिर बकौल श्रीलाल शुक्ल; “हिंदी का लेखक जन्म से फिलास्फर होता है परन्तु बचपन की कुसंगतियों के चलते लेखक बन जाता है.”

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    • लोकतन्त्र का यही निरालापन है कि सब लोग सब कुछ करने को स्वतन्त्र हैं । अभिनेत्री ने अमुक ड्रेस कब कब पहनी, इस विषय पर जीविका चला लेते हैं ।

      आखिर बकौल श्रीलाल शुक्ल; “हिंदी का लेखक जन्म से फिलास्फर होता है परन्तु बचपन की कुसंगतियों के चलते लेखक बन जाता है.”

      शुकदेव गोस्वामी संभवतः इसीलिये 16 वर्ष की आयु में गर्भ से निकले और हमें लेखक बनाने के लिये छोड़ गये । :)

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  10. Gyandutt Pandey says:

    महान चरित्रों से प्रेरणा ली जा सकती है। पर महान बनने का प्रयास पर्सनालिटी एथिक्स के डोमेन में आता है। बहुत कुछ ऐसे कि रट्टा मार कर परीक्षा पास करने का प्रयास या इंजेक्शन दे कर बड़ी लौकी उगाने का प्रयास।
    व्यक्ति आत्म विकास के प्रति सतत प्रयत्नशील रह सकता है, रहना चाहिये। शेष ईश्वर की कृपा पर छोड़ देना चाहिये।
    अर्जुन (यत्न) और कृष्ण (ईश्वरीय कृपा) का जब फ्यूजन होता है, तो श्रीविजय मिलती है!

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  11. Hemant kumar says:

    Kafee gahan chintan men doobe hain ap—-tabhee itanee darshanik post likhee apne—.achchha laga padhakar.

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  12. sanjay kumar says:

    स्वांतह सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा भाशा निबन्धम अति मनजुलम आतनोति.
    गोस्वामी तुलसीदास ने स्वांतह सुखाय रामचरितमानस् की रचना की थी लेकिन उनका स्वांतह सुखाय इतना उदार और व्यापक था कि वो स्वांतह सुखाय न रह्कर सर्वजन सुखाय, बहुजन हिताय बन गया.महान बनने के लिये शायद यही आवश्यक्ता है कि उस्के सिरे को अप्ने अन्दर ही खोजा जाये. बाकी हिसाब दुनिया अप्ने आप रख लेगी.

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  13. MOHAN says:

    प्रवीण!
    आपकी पोस्टें अब बहुत टाइम खाने लगी हैं।
    यह शिकायत नहीं, स्वीकारोक्ति है -कि बहुत पसंद आने वाली चीज़ें लिख रहे हो भाई! :)

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  14. MOHAN says:

    ज्ञानदत्त जी!
    आपका प्रयोग जारी है, मगर हमें तो बहुत भा गया है। दिल आ गया है। नशा छा गया है। अइसी-अइसी पोस्टन अउर अइसी-अइसी टिप्पणियन के कारण लगत है कि बज़ अब बजबजा गया है, हियाँ टाइप बात करिबे, इहै मने माँ समा गया है। :)

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  15. आज ही दोनों पोस्ट एक साथ पढ़े…यह सही है.ये छः गुण जिसमे भी होंगे ,वह महानता की श्रेणी में अपने आप ही आ जायेगा..पर पूरे छः गुण तो असंभव ही हैं…अगर संपत्ति,शक्ति,यश और सौन्दर्य होगा तो फिर ज्ञान और त्याग के लिए स्थान नहीं होता…और अगर त्याग की भावना होगी तो फिर संपत्ति कहाँ शेष बचेगा??
    मेरी समझ से महान वही हैं, जिनके कार्य और विचार अनुकरणीय हों…और हर एक की दृष्टि इस सन्दर्भ में अलग है..अगर क्रिकेट खेलने वालों के लिए सचिन महान हैं तो प्रेमी युगल के लिए रोमियो-जूलियट,लैला-मजनू…ऐसे ही लेखकों, विचारकों, राजनीतिज्ञों,समाजसेवकों,..सबके अपने अपने पसंदीदा महान व्यक्तित्व हैं.

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  16. Abhishek says:

    “सम्पत्ति, शक्ति, यश, सौन्दर्य, ज्ञान और त्याग” इनमें से सभी एक साथ हों तो फिर वो महानता की आइडियल स्थिति हो जायेगी. लेकिन आइडियल और रियल में हमेशा फर्क तो होता ही है… एक नया रिलेशन, एक नया कांसटैंट, एक नया मानक कि कौन कितने प्रोपोर्शन में चाहिए, तो सोचना ही होगा रियल लाइफ में.
    अब इन छः में से कुछ यत्न करके पाए जा सकते हैं लेकिन सभी नहीं… जैसे सौन्दर्य, और संभवतः शक्ति भी. मुझे नहीं लगता कि प्रकृति उनको महान बनने का मौका नहीं देगी जिनके पास प्रकृतिप्रदत्त एक बात नहीं ! तो इन छः में से जो अलग अलग परमुटेशन कम्बीनेशन बनेगे (अलग-अलग प्रोपोर्शन में भी) उनमें से कई महानता की तरफ ले जाने में सक्षम होंगे. लिहाजा ये अपरिभाषित सा है एक कंक्रीट फोर्मुले में बांधना मुश्किल ही है.

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    • महान पुरुषों के गुणों का अघ्ययन से कोई कोरिलेशन बन सकता है पर ये गुण एक पारस्परिक प्रभाव रखते हैं । यदि किसी के जीवन में समय के संदर्भ में कैसे कैसे गुणों का प्रभाव का अध्ययन हो तो संभवतः कुछ एकरूपता निकल आये ।

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  17. अजित says:

    किसी सज्जन की ही टिप्पणी दुहरा रहा हूँ….महानता परिष्थिति और समय के सापेक्ष तय होती है ……महान होना और महान कहलवाया जाना दोनों बहुत ही भिन्न बातें हैं…..नीवं की ईंट को किस श्रेणी में रखा जाये…..शायद महानता से ऊपर का कोई दर्जा होना चाहिए…..वैसे महानता लोलुप भी देखें गए हैं…..हिस्सेदारी शायद उनके लिए कौतुक से ज्यादा कुछ भी नहीं…..मगर महानतम में नाम शुमार करा गए हैं…..सच कहूँ तो महानता बहुत कुछ अपनी ही नज़रों में ऊँचा उठने से ज्यादा अच्छे से परिभाषित होती है…..कुछ विचार आये बस साझा करना समयोचित लगा….अन्यथा ना लें…..अजित

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  18. महान … इस शब्द ने बड़े घात-प्रतिघात भी सहे हैं .. सकारात्मक और नकारात्मक
    दोनों रूपों को वहां किया है इसने .. व्यंग्य में ही सही लोग कह देते हैं ‘फलनवा तो बड़ा
    महान है ..” … ‘आप बड़े महान हैं ” … आदि ..
    हर समय में इसकी व्याख्या अलग-अलग
    होती रही .. दरअसल यह ( महानता ) अन्य मूल्यों की तरह एक मूल्य है जिसे हम कई
    समय , अवधारणाओं , निकषों से परखते हैं … सुन्दर लेख .. आभार !

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  19. Gyandutt Pandey says:

    प्रवीण ने टिप्पणियों को बोलचाल के स्तर पर लाने के लिये बहुत सार्थक प्रयास किया है। वर्डप्रेस की थ्रेडेड कमेण्ट की तीन लेयर की व्यवस्था ने भी बहुत सुविधा दी है। मेरे विचार से, अंतत: मात्र टिप्पणियां दर्ज करने और इस प्रकार की डिस्कशन शैली के बीच कहीं पासंग बैठेगा।

    मुझे तो यह प्रसन्नता है कि यह प्रयोग मुझे नहीं करना पड़ा, प्रवीण ने उसके लिये समय निकाला! :)

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  20. aradhana says:

    वाह ! सबसे बाद में आकर पढ़ने का मज़ा ही कूछ और होता है…पूरा वाद-विवाद पढ़ लिया, उसमें से कुछ संवाद भी निकाल लिये…बस इतना कहना चाहूँगी कि आज धन की महत्ता भले ही बढ़ गयी हो, पर ये महानता का मानक कभी नहीं बन सकता.

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    • वारेन बफ़े महान माने जाते है क्यूकि न सिर्फ़ वो धनी है बल्कि ये धन उन्होने कितनी मुश्किलो से बनाया है.. इसलिये वो ज्ञानी भी है.. धीरू भाई अम्बानी को भी इसलिये शायद कुछ लोग महान मानते होगे..

      धन कही न कही तो महानता का मानक है ही..

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    • आराधना व पंकज, दोनों से सहमत । पंकज धन के अर्जन के बारे में बता रहे हैं जब कि आराधना धन के उपयोग के बारे में इंगित कर रही हैं । धन के अर्जन में जो परिश्रम व ज्ञान लगता है, वह सबके बात नहीं । धीरू भाई ने देश को एक नाम, युवकों को रोजगार व शेयरहोल्डरों को धन दिया है । अर्जित धन का उपयोग भी उनके पुत्र उद्योगों में कर रहे हैं और सबको लाभ पहुँचा रहे हैं । इस दृष्टि से उन्हें महान माना जाना चाहिये ।
      यदि किसी की लॉटरी लगती है और आया धन वह भोग विलास में उड़ा देता है तो उसे हम मूर्ख की संज्ञा देंगे ।
      कुछ अर्जन में महान बनते हैं कुछ उपयोग में । कुछ आये धन का सदुपयोग करते हैं । कुछ अर्जित धन को उड़ा देते हैं ।
      अतः आप दोनों ही सही हैं ।

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