पण्डित छन्नू लाल मिश्र

दीर्घा

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शुक्रवार को आदेश हुआ कि मंडुआडीह (वाराणसी) से नयी चलने वाली 15117/15118 मंडुआडीह-जबलपुर एक्स्प्रेस के उद्घाटन के अवसर पर पूर्वोत्तर रेलवे के चार विभागाध्यक्षों को उपस्थित रहना है। चार थे – निर्माण संगठन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी श्री ओंकार सिंह, … Continue reading

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मार्कण्डेय महादेव

दीर्घा

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वाराणसी वरुणा से असी तक का क्षेत्र है। काशी कहां से कहां तक है? उस दिन मैने गोमती के संगम पर मार्कण्डेय महादेव का स्थल देखा – उसे दूसरी काशी भी कहा जाता है। तब लगा कि काशी शायद गोमती … Continue reading

उम्र की फिसलपट्टी उतरता सीनियरत्व


मैने यह पोस्ट पोस्ट न की होती अगर मुझे प्रवीण की एक नई पोस्ट के बारे में सूचना देने की कवायद न करनी होती। यह पोस्ट ड्राफ्ट में बहुत समय से पड़ी थी। और अब तो काफी घटनायें गुजर चुकी हैं। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के काण्ड के लिये बापी महतो को पकड़ा जा चुका है (अच्छा हुआ, पकड़ गया, नहीं तो उसके कामरेड लोग समाप्त कर देते!)


प्रवीण पाण्डेय ने अपने ब्लॉग पर नई पोस्ट लिखी है – २८ घण्टे उसे पढ़ने के लिये आप उनके ब्लॉग पर जायें। यह पोस्ट पढ़ कर मुझे लगा जैसे नव विवाहित कवि हृदय गद्य में कविता लिख रहा हो –

… पर तुम्हारी आँखें मेरी ओर उस समय क्यों नहीं घूमी जब मैं चाह रहा था । तुम्हारी ओर देखते हुये तुम्हारे कन्धों को मोड़ना चाह रहा था अपनी ओर । लगता है, मेरी आँखों में अब वह बल नहीं रहा जो खींच ले तुम्हारी दृष्टि, अचानक, बलात, साधिकार ।

मुझे व्यग्रता है कि तुम्हारी आँखों ने मेरी आँखों की अवहेलना कर दी ।

मेरा प्रेम रोगग्रसित है । पहले तो अवहेलना व अधिकार जैसे शब्द नहीं आते थे हमारे बीच । पर पहले तो तुम्हारी आँखें हमेशा मेरी ओर ही मुड़कर देखती थी और मेरी यात्राओं को यथासम्भव छोटा कर देती थी ।…


Oct05 009 सरकारी नौकरी में सीनियॉरिटी समय से पक कर मिलती है। जब जूनियर होते हैं, तो घर जूनियॉरिटी के हिसाब से छोटे मिलते हैं। उस समय छोटे बच्चों के साथ ज्यादा स्पेस – यानी बड़े घर की दरकार होती है। पक कर सीनियर बनने पर बाल बच्चे किनारे लग गये होते हैं, तब बड़े घर मिलते हैं – बड़े बंगले। और वे इतने बडे लगते हैं कि उनके अधिकांश भाग पर भूत इत्मीनान से रहते होंगे – बिना मकान किराया दिये।

सरकारी नौकरी के बाहर देखता हूं तो पाता हूं कि सीनियरत्व उम्र की फिसलपट्टी तेजी से उतरता जा रहा है। तीस – पैंतीस का व्यक्ति सीनियर हो ले रहा है। चार पांच नौकरियां फलांग चुका होता है। बड़े झक्कास पदनाम युक्त होता है। बैंक बैलेंस भी इतना होता है, जितना हमारी इतने साल की नौकरी में न हुआ! हमारी पीढ़ी सीनियरता को पेड़ पर लगे कटहल की तरह धीमे पकाने में नष्ट हो गयी। और अब लोग सीनियरता लीची की तरह पकाने लगे हैं!

Gyan670 अखबार में हेडलाइन्स देखी कि ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के काण्ड को सीनियर माओवादी ने हरी झण्डी दी थी। जिज्ञासा वश खबर पढ़ी तो पता चला कि यह सीनियर माओवादी, कोई जयन्त नामधर्मी व्यक्ति उन बैठकों की अगुआई कर रहा था, जिनमें यह तय हुआ था कि रेलगाड़ी गिराई जाये।

इस जयन्त की उम्र भी लिखी थी – बाईस साल! सन २००३ में वह भर्ती हुआ था नक्सल आंदोलन में; पन्द्रह साल का था तब। अब वह सीनियर हो चला है। जयन्त जी ने रेल गिराई/गिरवाई हो – यह तो जांच तय करेगी। हमें तो मात्र उसकी उम्र और उसकी सीनियॉरिटी से लेना देना है! जाम्बी थाना  के अमचूरिया गांव के जयन्त की सीनियॉरिटी को देख ईर्ष्या है। रेल चलाने में सीनियॉरिटी हमें इतने समय बाद मिली और रेल गिराने में सीनियॉरिटी जयन्त मात्र बाईस वर्ष की उम्र में पा गये!

सच में, एक शानदार फिसलपट्टी पा गया है सीनियरत्व!    


त्रासदियां – प्रवीण पाण्डेय की पोस्ट


भोपाल त्रासदी गुजर गई। वह किसी अन्य रूप में पुन: सम्भव है। ऐसी ही एक घटना सन २०१८ में घटी। उसके विषय में  प्रवीण पाण्डेय के ब्लॉग पर उनकी पोस्ट त्रासदियां में पढ़ें।


नई पोस्ट – प्रवीण पाण्डेय


प्रवीण पाण्डेय की नई पोस्ट – मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगा, उनके ब्लॉग न दैन्यं न पलायनम् पर।

Babaji 
कृपया लिंक पर जाने का कष्ट करें।


न दैन्यं न पलायनम्


प्रवीण पाण्डेय ने अन्तत: अपना ब्लॉग बना लिया – न दैन्यं न पलायनम्

पहली पोस्ट आज पब्लिश हो रही है। उसका अंश - 

स्वर्ग

नहीं, यह यात्रा वृत्तान्त नहीं है और अभी स्वर्ग के वीज़ा के लिये आवेदन भी नहीं देना है। यह घर को ही स्वर्ग बनाने का एक प्रयास है जो भारत की संस्कृति में कूट कूट कर भरा है। इस स्वर्गतुल्य अनुभव को व्यक्त करने में आपको थोड़ी झिझक हो सकती है, मैं आपकी वेदना को हल्का किये देता हूँ। …

प्रवीण की पोस्ट पूरा पढ़ने के लिये उनके ब्लॉग-पोस्ट पर जाने का कष्ट करें।


मधुगिरि के चित्र


यह स्लाइड-शो है मधुगिरि के चित्रों का। पिकासा पर अप-लोड करना, चित्रों पर कैप्शन देना और पोस्ट बनाना काफी उबाऊ काम है। पर मैने पूरा कर ही लिया!

ललकारती-गरियाती पोस्टें लिखना सबसे सरल ब्लॉगिंग है। परिवेश का वैल्यू-बढ़ाती पोस्टें लिखना कठिन, और मोनोटोनी वाला काम कर पोस्ट करना उससे भी कठिन! :-)

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fist चर्चायनललकार छाप ब्लॉगिंग के मध्य कल एक विज्ञान के प्रयोगों पर ब्लॉग देखा श्री दर्शन लाल बावेजा का – यमुना नगर हरियाणा से। वास्तव में यह ब्लॉग, हिन्दी ब्लॉगिंग में आ रही सही विविधता का सूचक है! यहां देखें मच्छर रिपेलेंट लैम्प के बारे में।

काश बावेजा जी जैसे कोई मास्टर उस समय मुझे भी मिले होते जब मैं नेशनल साइंस टैलेण्ट सर्च परीक्षा के लिये प्रयोग की तैयारी कर रहा था – सन् १९७०-७१ में! 


मधुगिरि


Master Plan विश्व के द्वितीय व एशिया के सर्वाधिक बड़े शिलाखण्ड की विशालकाया को जब अपने सम्मुख पाया तो प्रकृति की महत्ता का अनुभव होने लगा। जमीन के बाहर 400 मी की ऊँचाई व 1500 मी की चौड़ाई की चट्टान के शिखर पर बना किला देखा तो प्रकृति की श्रेष्ठ सन्तान मानव की जीवटता का भाव व सन्निहित भय भी दृष्टिगोचर होने लगा।

बंगलोर से लगभग 110 किमी की दूरी पर स्थित मधुगिरि तुमकुर जिले की एक सबडिवीज़न है। वहीं पर ही स्थित है यह विशाल शिलाखण्ड। एक ओर से मधुमक्खी के छत्ते जैसा, दूसरी ओर से हाथी की सूँड़ जैसा व अन्य दो दिशाओं से एक खड़ी दीवाल जैसा दिखता है यह शिलाखण्ड। गूगल मैप पर ऊपर से देखिये तो एक शिवलिंग के आकार का दिखेगा यही शिलाखण्ड।

Look 1st Padav तीन तरफ से खड़ी चढ़ाई के कारण ही इसे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मान गंगा राजाओं ने इस पर किले का निर्माण प्रारम्भ कराया पर विजयनगर साम्राज्य में ही यह अपने वैभव की पूर्णता को प्राप्त हुआ। अपने इतिहास में अभेद्य रहने वाला यह किला केवल एक बार हैदर अली के द्वारा जीता गया। अंग्रेजों के शासनकाल में इसका उपयोग 1857 के स्वतन्त्रता सेनानियों के कारागार के रूप में हुआ।

बिना इतिहास व भूगोल जाने जब हमने चढ़ने का निश्चय किया तो दुर्ग बड़ा ही सरल लग रहा था पर शीघ्र ही दुर्ग दुर्गम व सरलता विरल होती गयी। अब देखिये, 400 मी की ऊँचाई, एक किमी से कम दूरी में। 30 डिग्री की औसत चढ़ाई चट्टानों पर और कई जगहों पर खड़ी चढ़ाई। प्रथम दृष्ट्या इसे पारिवारिक पिकनिक मान बैठे हम अपनी अपनी क्षमताओं के अनुसार बीच मार्ग पर ही ठहरते गये।

यह पोस्ट श्री प्रवीण पाण्डेय की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। प्रवीण बेंगळुरू रेल मण्डल के वरिष्ठ मण्डल वाणिज्य प्रबन्धक हैं।

चट्टानों पर पैर जमाने भर के लिये बनाये गये छोटे छोटे खाँचे ही मार्ग के सहारे थे। उनके इतर थी चट्टानों की सपाट निर्मम ढलानें जिस पर यदि दृष्टि भी जाकर लुढ़क जाती तो हृदय में एक सिरहन सी हो उठती। यदि उस समय कुछ सूझता था तो वह था अगला खाँचा। न ऊपर देखिये, न नीचे की सोचिये। आपके साथ घूप में चलती आपकी ही छाया, कान में सुनायी पड़ता हवा के आरोह व अवरोह का एक एक स्पष्ट स्वर, अपने में केन्द्रित हृदय की हर धड़कन और मन की एकाग्रता में रुका हुआ विचारों का प्रवाह। ध्यान की इस परम अवस्था का अनुभव अपने आप में एक उपलब्धि थी मेरे लिये।

इस चट्टानी यात्रा के बीच छह पड़ाव थे जहाँ पर आप विश्राम के अतिरिक्त यह भी निर्णय ले सकते हैं कि अभी और चढ़ना है या आज के लिये बस इतना ही।

Look 3rd Padav जहाँ कई लोग एक ही पड़ाव में अपने अनुभव की पूर्णता मान बैठे थे, हमारे पुत्र पृथु की एकांगी इच्छा थी, हैदर अली की भाँति दुर्ग फतह करने की। दस वर्ष की अवस्था, साढ़े चार फुट की नाप, पर उत्साह अपरिमित। जहाँ हम अत्यन्त सावधानी से उनसे नीचे रहकर आगे बढ़ रहे थे, वहीं वह आराम से बतियाते हुये चट्टानें नाप रहे थे। तीसरे पड़ाव के बाद जब चढ़ाई दुरूह हो गयी और चट्टान पर लगे लोहे के एंगलों को पकड़कर चढ़ने की बात आयी तो हमें मना करना पड़ा। पृथु के लिये दूरी पर लगे एंगलों को पकड़कर सहारा लिये रहना कठिन था। दुखी तो बहुत हुये पर बात मान गये। यहीं मेरे लिये भी यात्रा का अन्त था। वहाँ पर थोड़ा विश्राम ले हम लोगों ने उतरना प्रारम्भ किया।

नीचे देखते हुये बैठकर उतरना बहुत ही सावधानी व धैर्य का कार्य था। एड़ियों को खाँचों में टिकाकर, दोनों हाथों में शरीर का भार आगे की ओर बढ़ाते हुये अगले खाँचे पर बैठना। जिस दिशा में बढ़ना था, संतुलन का इससे अच्छा उपाय न था। बहुत आगे तक नीचे देखने का मन करता है पर बार बार रोकना पड़ता है। चट्टानें गर्म थीं अतः हम लोग हाथ को बीच बीच में ठंडा करते हुये उतर रहे थे । कठिन चट्टानों में उतरने में अधिक समय लगा।

प्रकृति की मौन शिक्षा बिना बोले ही कितना कुछ दे जाती है। अपनी शारिरिक व मानसिक क्षमताओं को आँकने का इससे अच्छा साधन क्या हो सकता है भला?

मेरे दो युवा श्याले नीलाभ व श्वेताभ, श्री अनुराग (एस डी एम महोदय) के संग अन्तिम पड़ाव तक गये। पीने के पानी की कमी थी, पानी बरसने की संभावना थी, पर यह सब होने पर भी वे लोग रुके नहीं।

Anurag with wife श्री अनुराग तिवारी जी मधुगिरि के एस डी एम हैं। एक कन्नडिगा की भाँति सहज व मृदुल। स्थानीय भाषा व परिवेश में अवलेहित। अगले दिन 16 मुकद्दमों का निर्णय लिखने की व्यस्तता होने के बाद भी पथप्रदर्शक बनने को सहर्ष मान गये और सपत्नीक हमारे साथ चले। जिस आतिथेय भाव के साथ उन्होने हमारा सत्कार किया, कठिन चढ़ाई पर उत्साहवर्धन किया और स्थान के बारे में प्रमाणिक ऐतिहासिक व्याख्यान दिया, वह उनके समग्र व्यक्तित्व की ऊँचाई का परिचायक है।

बकौल उनके "पर्वतारोहण में शिखरों पर नहीं वरन स्वयं पर विजय पायी जाती है।"


प्रवीण पाण्डेय ने इस बार इस पर्वतारोहण के अनेक चित्र भेजे थे, पर प्रवास में होने के कारण मोबाइल कनेक्शन से उनका स्लाइड शो के रूप में प्रयोग नहीं कर पाया! :(