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आज श्री सन्तोष कुमार सिंह मिलने आये। वे टोकियो, जापान से कल शाम नई दिल्ली पंहुचे और वहां से अपने घर वाराणसी जा रहे थे। रास्ते में यहां उतर कर मुझसे मिलने आये। सन्तोष तेरह साल से जापान में हैं। … Continue reading
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आज श्री सन्तोष कुमार सिंह मिलने आये। वे टोकियो, जापान से कल शाम नई दिल्ली पंहुचे और वहां से अपने घर वाराणसी जा रहे थे। रास्ते में यहां उतर कर मुझसे मिलने आये। सन्तोष तेरह साल से जापान में हैं। … Continue reading
मैं अर्थर हेली का उपन्यास डिटेक्टिव पढ़ रहा था। नेट पर नहीं, पुस्तक के रूप में। यह पुस्तक लगभग दस बारह साल पहले खरीदी थी। लुगदी संस्करण, फुटपाथ से। नकली छपाई होने के चलते इसमें कुछ पन्ने धुन्धले हैं – कुछ हिस्सों में। इसी पढ़ने की दिक्कत के कारण इसे पढ़ना मुल्तवी कर दिया था।
[लुगदी (पाइरेटेड) संस्करण वाली पुस्तकें लेना, अपनी माली हालत बेहतर होने के साथ साथ बन्द कर दिया है। पिछले सात आठ साल में ऐसी कोई किताब नहीं खरीदी!]
पर यूं कहें कि हर किताब के पढ़ने के दिन पूर्व नियत होते हैं! इसका नम्बर अब लगना था।
डिटेक्टिव में कई प्रकरण आते हैं जिनमें कोई भी पोलीस अधिकारी किसी व्यक्ति को तहकीकात के लिये हिरासत में लेता है तो सबसे पहले मिराण्डा शब्द/मिराण्डा चेतावनी कहता है। ये शब्द हैं – Continue reading
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रामपुर (छद्म नाम) के सैंतालीस प्रतिशत लोग काम के हिसाब से अनपढ़ हैं। प्रौढ़ शिक्षा एवम बेसिक कर्मठता योजना अधिकारी की एक रिपोर्ट में रामपुर के बारे में चौंकाने वाली रिपोर्ट बनाई है। इसके अनुसार लगभग आधे नागरिक अखबार नहीं … Continue reading
आपने द वर्ल्ड इज फैट नहीं पढ़ी? 2010 के दशक की क्लासिक किताब। थॉमस एल फ्रीडमेन की द वर्ल्ड इज फ्लैट की बिक्री के सारे रिकार्ड तोड़ देने वाली किताब है। नहीं पढ़ी, तो आपको दोष नहीं दिया जा सकता। असल में इसका सारा रॉ-मेटीरियल तैयार है। बस किताब लिखी जानी भर है। आपका मन आये तो आप लिख लें! ![]()
पिछले दशक में मोटे (ओवरवेट) और मुटल्ले (ओबेस) लोगों की संख्या दुनियाँ में दुगनी हो गयी है। अब 13 करोड मोटे/मुटल्ले (मोटे+मुटल्ले के लिये शब्द प्रयोग होगा – मोटल्ले) वयस्क हैं और चार करोड़ से ज्यादा बच्चे मोटल्ले हैं।
मोटापा अपने साथ लाता है एक बीमारियों का गुलदस्ता। मधुमेह, दिल का रोग और कई प्रकार के केंसर। अनुमान है कि ढ़ाई करोड़ लोग सालाना इन बीमारियों से मरते हैं। मानें तो मोटापा महामारी (epidemic) नहीं विश्वमारी (pandemic) है।
मुझे पर्यावरण के प्रति चिंता है। मुझे विकास के प्रति भी चिंता है। यह तय है कि तीव्र गति से विकास के लिये हमें ऊर्जा उत्पादन की दर बढ़ानी होगी। इतनी बढ़ी दर के लिये नॉन कंवेंशनल स्रोत पर्याप्त नहीं होंगे। Continue reading
यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की कैलीफोर्निया प्रवास पर सातवीं अतिथि पोस्ट है।
इस बार भी तसवीरों के माध्यम से आप को अपनी बात बताना चाहता हूँ।
यहाँ तसवीरें छोटी आकार में दिखेंगी। यहां तसवीरों को resize करके यहाँ पेश रहे हैं ताकि पन्ना जल्द ही लोड हो जाए। साथ ही पिकासा स्लाइड-शो का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे पन्ना भी ज्यादा स्क्रॉल न करना पड़े।
आपकी यदि मूल तसवीर में रुचि है तो पोस्ट के अंत में दी हुई कडी पर जाकर पूरी तसवीर देख लीजिए। पिछले पोस्ट पर कुछ मित्रों ने टिप्प्णी की थी के चित्र बहुत छोटे हैं, इस लिये इस बार हमने यह तरीका अपनाया।
योसेमाइट योसमिटी नैशनल पार्क (Yosemite National Park)
जिन्हें प्रकृति का सौन्दर्य से लगाव हैं उनको यह पार्क बहुत अच्छा लगेगा। पहाड, चट्टान, जंगल, नदी. झरने, जल प्रपात वगैरह मिलेंगे यहाँ। लोग यहाँ ट्रेक्किंग और कैंपिन्ग करने आते हैं।
हम भी एक रात यहीं ठहरे थे पर किसी होटल में। इस उम्र में हमसे कैंपिन्ग नहीं होगा।
पानी का प्रवाह बहुत तेज था। पानी भी एकदम ठंण्डा और शुद्ध।
रंग से लगता था कि पानी नहीं बल्कि बर्फ़ है पर यह तो केवल पानी के ऊपर का झाग का रंग है। बहुत देर तक हम यहीं बैठे रहे।
पार्क इतना बडा है की सब कुछ देखने के लिए कई दिन लग सकते हैं
हम जैसे पर्यटकों की सुविधा के लिए एक open air trolley bus का प्रबन्ध था। इसमे एक guide भी था जो सब कुछ समझाता था।
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सान्ताक्रुज बीच (Santa Cruz Beach)
भारत में रहते हम Arabian Sea और Bay of Bengal दोनों देखे हैं। कन्या कुमारी भी गया हूँ जहाँ दोनो का संगम होता है।
भारत के अन्य स्थलों पर आप सागर में या तो सूर्योदय या सूर्यस्त देख सकते हैं।
कन्या कुमारी ही ऐसी जगह है जहाँ आप सूर्योदय और सूर्यस्त दोनों सागर में होते देख सकते हैं। पहली बार प्रशान्त महासागर का अनुभव किया हमने कैलीफोर्निया के सान्ताक्रुज बीच (Santa Cruz Beach) पर। यहां भारत की सी भीड़ भाड़ बिल्कुल नहीं थी। पानी और रेत एकदम साफ़ थे।
पानी बहुत ठंण्डा था और मैं सोचता रहा पानी के अन्दर जाऊं या नहीं।
हिम्मत जुटाकर थोडा आगे निकला। चित्र में देखिए पानी की ठंण्डक के कारण मेरी प्रतिक्रिया। मेरे कन्धे आप को बता देंगे कि पानी कितना ठंण्डा था।
मैने पत्नी को भी आमंत्रित किया था, पानी का अनुभव करने के लिए पर उसने पहले तो मना कर दिया। उसे ठंण्ड से डर था। हमने प्रोत्साहित किया और किसी तरह वह भी पानी में अपने पैर गीले करने के लिए राजी हो गई। पर प्रोत्साहन के शब्द काफ़ी नहीं थे। पूरी जोर लगाकर हमें उसे उठाना पडा।
इन चित्रों को देखकर एक दोस्त ने मुझसे कहा था , "अरे यह तो अमरीकी beach नहीं लग रहा है"।
हमने पूछा "ऐसा क्यों सोचते हो?" उत्तर मिला " यहाँ सभी कपडे पहने हुए हैं। बिकिनी पहनी महिलाएं कहाँ है?" हमें समझाना पडा के यह ठंड का मौसम था और यह गरमी के दिनों, Florida के Miami beach का दृश्य नहीं है।
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गोल्डन गेट ब्रिज (Golden Gate Bridge)
पेशेवर एक structural engineer हूँ मैं। ३६ साल से बस इसी पेशे से जुडा हुआ हूँ। सो कैलिफ़ोर्निया जाकर गोल्डन गेट पुल न देखूं, यह हो ही नहीं सकता! कमाल का ब्रिज है यह!
करीब १९३० के आसपास बना था और दुनिया में अपने जमाने में सर्वश्रेष्ठ पुल माना जाता था।
आज भी हम ऐसी संरचनाएं देखकर प्रेरित होते हैं।
सागर से हम इसका चित्र खींच नहीं सकते थे। पुल के एक छोर से ली हुई तसवीर देखिए। पुल पर चलते चलते हमने काफ़ी समय बिताया।
उस जमाने में welding की प्रथा नहीं थी। स्टील को जोडने के लिए rivets का प्रयोग होता था।
Steel structures का design तो मेरा speclialization का विषय है। सोचा इस पर अपने परिवार को एक lecture दूँ। पर पत्नी को कहाँ इसमे रुचि होगी। वह तो खाडी की सुन्दरता को निहार रही है। क्षितिज पर सैन फ़्रैन्सिस्को शहर दिख रहा है।
बेटी को देखिए। मानो यह कह रही है मेरे दामाद से "कैसी लग रही हूँ। मेरी अच्छी तसवीर लेना। मारो गोली पापा के इन rivets को"!
बेचारा दामाद ही था जिसने मेरा rivetted connections पर व्याख्यान सुना।
पुल से शहर कैसे दिखता है इसका अन्दाजा चित्र से आप को मालूम हो जाएगा| http://picasaweb.google.com/s/c/bin/slideshow.swf
सैन फ़्रैन्सिस्को एक पुराना शहर है। आज भी वहाँ ट्राम (trams) चलते हैं। हमने इसका भी आनंद उठाया।
आज बस इतना ही।
आगे अगली कडी में।
इन तसवीरों को पूरी साइज़ में देखने के लिए इस कडी को आजमाइए।
तसवीरों को आप zoom करके देख सकते हैं।
शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ
मैं पर्यटन पर नैनीताल नहीं आया। अगर आया होता तो यहां की भीड़ और शानेपंजाब/शेरेपंजाब होटल की रोशनी, झील में तैरती बतख नुमा नावें, कचरा और कुछ न कुछ खरीदने/खाने की संस्कृति को देख पर्यटन का मायने खो बैठता।
पैसे खर्च कर सूटकेस भर कर घर लौटना क्या पर्यटन है? या अब जब फोटो खीचना/वीडियो बनाना सर्व सुलभ हो गया है, तब पिंकी/बबली/पप्पू के साथ सन सेट का दृष्य उतारना भर ही पर्यटन है?
पता नहीं, मैं बहुत श्योर नहीं हूं। मैं इसपर भी पक्की तरह से नहीं हुंकारी भर सकता कि फलानी देवी या फलाने हनुमान जी को मत्था टेक पीली प्लास्टिक की पन्नियों में उनके प्रसाद के रूप में लाचीदाना ले लौटना भी पर्यटन है। मैने काठगोदाम उतर कर सीधे नैनीताल की दौड़ नहीं लगाई। मुझे वहां और रास्ते के अंग्रेजी बोर्डिंग स्कूलों में भी आकर्षित नहीं किया। एक का भी नाम याद नहीं रख सका।
ड्राइवर ने बताया कि काठगोदाम में कब्रिस्तान है। मेरी रुचि वहां जा कर उनपर लगी प्लेक पढ़ने में थी। ड्राइवर वहां ले नहीं गया। पर वह फिर कभी करूंगा। मुझे रस्ते के चीड़ के आसमान को चीरते वृक्षों में मोहित किया। और मैं यह पछताया कि मुझे कविता करनी क्यों नहीं आती। ढ़ाबे की चाय, रास्ता छेंकती बकरियां, पहाड़ी टोपी पहने झुर्रीदार बूढ़ा, भूस्खलन, दूर पहाड़ के ऊपर दीखती एक कुटिया – ये सब लगे पर्यटन के हिस्से।
खैर, यह मुझे समझ आता है कि सूटकेस भर कर घर लौटने की प्रक्रिया पर्यटन नहीं है।
चीड के पेड़, धान के खेत, पाकड़ के वृक्ष, पहाड़ी सर्पिल गौला नदी शायद अपनी सौन्दर्य समृद्धि में मगन थे। पर अगर वे देखते तो यह अनुभव करते कि ज्ञानदत्त का ध्यान अपनी घड़ी और अपने पर्स पर नहीं था – वह उनसे कुछ बात करना चाहता था। वह अभी पर्यटक बना नहीं है। अभी समझ रहा है पर्य़टन का अर्थ।
इतनी जिन्दगी बिता ली। कभी तो निकलेगा वह सार्थक पर्यटन पर!
यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की अमरीकी/कैलीफोर्निया प्रवास पर छठी अतिथि पोस्ट है।
इस बार बातें कम करेंगे और केवल चित्रों के माध्यम से आप से संप्रेषण करेंगे।
शॉपिंग:
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एक जमाना था, जब हम विदेश से चीजें खरीदकर लाने में गर्व महसूस करते थे। अब भूल जाइए इस बात को। कुछ चीज़ों को छोडकर, हम भारतीयों के लिए वहाँ से कुछ खरीदना मूर्खता ही लगता है।
सब कुछ यहाँ भारत में उपलब्ध है और बहुत ही कम दामों में।
कई सारी चीज़ें तो भारत, चीन, बंगला देश से वहाँ भेजी जाती हैं जहाँ तीन या चार गुना दामों पर बिकती हैं।
वैसे मॉल्स तो बहुत अच्छे हैं और हमारे मॉल्स से बडे हैं। चित्र देखिए।
हमने कई सारे मॉल्स देखे पर वहां कुछ खरीदने से हिचकते थे। पत्नी चीज़ें देखती थीं, अच्छी लगती थीं फ़िर दाम देखती थीं और झट मन में डॉलर को रुपयों में बदलती थीं और फ़िर चौंक जाती थी।
हम दूर से तमाशा देखते रहते थे।
बस किसी तरह कुछ तो वहाँ से खरीदकर ले ले जाना ही था।
लोग क्या कहेंगे? अरे! अमरीका से कुछ नहीं लाया? पत्नि ने अपनी लालसा पूरी की। यह देखिए, पत्नी और बेटी किन चीज़ों से आकर्षित हुए हैं। यहाँ की सभी वस्तुएं एशियाई देशों से वहाँ पहुंची हैं।
हमें चुप और खुश करने के लिए हम से पूछे बगैर मेरे लिए कुछ कपडे और एक घडी खरीदकर दी ।
जैसा मैंने पहली किश्त में बताया था, अमरीकी लोग ज्यादा दिखाई नहीं देंगे आपको।
चेहरे देखिए इस चित्र में। ग्राहक चीनी या कोरियाई लगते हैं।
एक बात हमें पसन्द आई। जब मॉल वाले कोई नई खाने लायक चीज़ बेचना चाहते हैं तो फ़्री सैंपल (free sample) का प्रबन्ध है। इस महिला को देखिए जो फ़्री सैंपल तैयार कर रही है। हमने अवसर पाकर खूब इन चीज़ों को चखा।
यह भी अच्छी चाल है। हम तो भोले भाले हैं। फ़्री सैंपल चखने के बाद वहाँ से छुपके से खिसक जाना हमें अच्छा नहीं लगा।
क्या सोचेंगे यह अमरीकी लोग भारतवासियों के बारे में? मन की शान्ति के लिए कुछ खरीदना पड़ा।
बर्फ़ का अनुभव
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आजीवन हम पश्चिम या दक्षिण भारत में ही रहे हैं। हमने ज़िन्दगी में बर्फ़ का अनुभव कभी नहीं किया था। कभी कशमीर या सिमला गए ही नहीं।
यह मेरा पहला मौका था बर्फ़ को देखने, छूने और उसका अनुभव करने का। हम Squaw Valley गये थे, जो Lake Tahoe टैहो के पास है। आप बर्फ़ की तसवीरें देखिए। उसपर चलने में थोडी कठिनाई हुई| चलने में पैर फ़िसलने का डर रहता था। पर कुछ देर बाद आसानी से चल सके।
पहली बार स्नोमैन (snowman) बनाने की कोशिश की। फ़्लॉप हुआ मेरा प्रोजेक्ट।
गणेशजी की मूर्ति बनाने निकला था और देखिए क्या बना पाया।
फ़िर भी गर्व से उस की एक तसवीर लेने में मुझे झिझक नहीं हुई।
Lake Tahoe भी गया था। अति सुन्दर झील है यह। एक किनारे पर रेत और दूसरे किनारे पर चिकने और गोल गोल कंकड।
पानी इतना ठंडा और शुद्ध कि हम तो बिना किसी हिचक उसे अपने हथिलियों में लेकर पीने लगे। भारत में हिम्मत नहीं होती ऐसी झीलों से पीने की, सिवाय हरिद्वार / हृषिकेश में गंगा के पानी के। ![]()
सैन फ़्रैन्सिस्को
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दो बार सैन फ़्रैन्सिस्को गया था। पत्नी के लाख मना करने के बावजूद, हम Apple I Store के अन्दर झांकने से अपने आप को रोक नहीं सके| उसे चिढ है इन गैड्जेटों से। कहती है "तुम्हारा इन चीज़ों से लगाव अस्थायी होता है। बाद में मुझे ही इन चीज़ों पर जमे धूल को साफ़ करना पडता है।"
करीब बीस मिनट Apple का नया Ipad को आजमाया। कमाल की चीज़ है यह। काश यहाँ भारत में उपलब्ध होता।
छोटी मोटी दुकानें तो कई सारे देखीं| दो नमूने पेश हैं:
सैन फ़्रैन्सिस्को चिडियाघर भी गया था| कुछ खास नहीं पर एक मोर को देखने पर भारत (जयपुर और पिलानी) की याद आ गई| मोर पिंजरे में बन्द नहीं था और इधर उधर घूमता रहता था|
और देखिए इस गोलमटोल और रोयेंदार भेड़ को। वह भी स्वतंत्रता से घूम रहा था और हमे इसे छूने ओर सहलाने कि अनुमति थी। केवल कुछ खिलाना भर वर्जित था।
जिन्दगी में पहली बार एक ध्रुवीय भालू( polar bear) देखा।
आगे अगली किस्त में ।
शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ