कैथी और कांवरिये


कैथी के गंगा तट पर कांवरिये
कैथी के गंगा तट पर कांवरिये

पिछले शनिवार वाराणसी से औंडिहार जाते हुये सब ओर कांवरिये दिख रहे थे। बनारस आते हुये – उनके कांधे पर डण्डी और उससे लटकी छोटी छोटी प्लास्टिक की लुटिया/कमण्डल में गंगा जल। डण्डी अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार सजाई हुयी – फूलों और आम की टेरियों से सजाने का युग अब समाप्त हो गया है। उनके स्थान पर प्लास्टिक की झालर, प्लास्टिक के ही फूल और बन्दनवार थे। धर्म और श्रद्धा का प्लास्टिक और प्रदूषण से वैर अभी नहीं हुआ है। कोई शंकराचार्य अभी नहीं जन्मे जो प्लास्टिक को धर्म विरोधी घोषित करते हों। विश्व हिन्दू परिषद भी ऐसा नहीं कहती, शायद।

उनके वस्त्र यद्यपि गेरुआ थे। पर अपेक्षानुसार मॉडर्न भी। टी-शर्ट और घुट्टन्ना गेरुआ रंग में। अधिकांश नंगे पैर थे। एक दशक बाद शायद रीबॉक गेरुआ रंग के स्पोर्ट्स शू निकाल दे तो वे फैशन में आ जायें। अभी तो लग रहा था कि अधिकांश के पैर में छाले पड़े हुये थे और उनकी चाल थकान या छालों के कारण धीमी हो चली थी। गनीमत थी कि बारिश के कारण सड़क गीली थी। तप नहीं रही थी।

मार्कण्डेय महादेव के बाद परिदृष्य बदल गया। उसके बाद ट्रक या ट्रेक्टर टॉली में झुण्ड के झुण्ड कांवरिये आने लगे – वे कैथी के तट पर गंगाजी से जल उठा कर चलने के लिये जा रहे थे।

जाती बार तो हम औंडिहार चले गये – रेलवे के काम से। पर वापस लौटते हुये वाहन को गंगा तट पर मोड़ लिया कैथी में। मुख्य सड़क से उतर कर करीब दो किलोमीटर दूर है कैथी का गंगा तट। वहां जाते कई वाहन – ट्रक, ट्रेक्टर-ट्रॉली और टेम्पो/ऑटो भरे हुये थे कांवरियों से। वापसी में पैदल आते हुये कांवरिये दिख रहे थे।

कैथी में जल लेने, रंगबिरंगे ऑटो में आये कांवरिये।
कैथी में जल लेने, रंगबिरंगे ऑटो में आये कांवरिये।

गंगा तट पर पंहुचते पंहुचते बारिश होने लगी। चिरैया उड़ान बारिश – कभी होती तो कभी रुक जाती। तट पर एक मेक-शिफ्ट दुकान के आगे मैं रुक गया बारिश से बचने को। उसमें कांवरियों के काम की सभी सामग्री बिक रही थी। कपड़े, रामनामी थैले (उनपर शंकर जी के चित्र, बोल-बम का नारा आदि छपे थे), प्लास्टिक की लुटिया/कमण्डल, डण्डी, प्लास्टिक के जरीकेन (2-3 लीटर क्षमता वाले) आदि थे।

एक कांवरिये ने फरमाइश की – प्लास्टिक की लुटिया की बजाय मिट्टी की नहीं है?

दुकान में बिकती कांवरियों की सामग्री
दुकान में बिकती कांवरियों की सामग्री

दुकानदार ने तड़ से जवाब दिया – “नहीं, मिट्टी वाली प्रशासन ने बैन कर दी है।”

लगा कि प्रशासन वह ढ़ाल है जिसे वैध-अवैध सब काम के लिये अड़ाया जा सकता है। … वैसे प्रशासन अगर प्लास्टिक की लुटिया/जरीकेन बैन कर दे तो पर्यावरण का बड़ा फायदा हो।

कांवरिये स्नान कर रहे थे और गंगाजल भर कर रवाना हो रहे थे। कुछ स्त्रियां भी थीं। मुझे बताया गया कि वे जल ले कर आस पास अपने गांवों के शिवालय पर चढ़ाती हैं। पुरुषों की तरह बाबा विश्वनाथ के मन्दिर तक नहीं जातीं काशी की ओर। कुछ कांवरिये स्नान के बाद अपना फोटो खिंचा रहे थे। वापस रवाना होते समय कुछ चंचलमन दिखे बोल-बम का नारा लगाते; पर कुछ ऐसे थे, जो श्रद्धा में सिर झुकाये धीमे धीमे भगवान का नाम बुदबुदा रहे थे। कुल मिला कर धार्मिक श्रद्धा गहरे में दिखी – कहीं सामुहिक, कहीं व्यक्तिगत। वह श्रद्धा मुझे भी छू ले रही थी। मुझे भी और मेरे कैमरे को भी।

सम्पत की नाव
सम्पत की नाव

एक मल्लाह अपनी सुन्दर सी नाव किनारे पर ले आया और आग्रह करने लगा कि मैं नाव पर घूम आऊं – किनारे किनारे कैथी से गोमती संगम तक। प्रति व्यक्ति 30 रुपया किराया। 10 आदमियों के बैठने की जगह। गंगाजी बढ़ी हुई थीं – सो हम लोगोंने मना कर दिया।

सम्पत के साथ मैं। नेपथ्य में उसकी नाव।
सम्पत के साथ मैं। नेपथ्य में उसकी नाव।

मैने उसके साथ उसकी नाव के आगे खड़े हो कर चित्र खिंचाया। प्रवीण पाण्डेय जी ने खींचा और मुझे मोबाइल से ही ट्रांसफर कर दिया। मल्लाह, नाम सम्पत, ने कहा कि उसे कुछ तो दे दूं मैं। सो फोटो खिंचाई के दस रुपये दे दिये मैने। हमारे सह कर्मी ने उससे चुहुल की कि अब तक तो वह मछली पकड़ता था, अब कैसे पर्यटन कराने लगा। सम्पत ने कसम खाते हुये कहा कि वह सावन में कत्तई मछली नहीं पकड़ता। पर उसके चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह बता रही थी कि वह सच नहीं कह रहा।

यह मछलियों का प्रजनन समय है। मल्लाह इस समय मछली पकड़ना बन्द कर देते हैं। पर यह नियम पालन करने वाले कम से कमतर होते जा रहे हैं। गंगा माई की ऐसी तैसी करने मे यह भी एक घटक है। आदमी अपनी हाही (लालच) के लिये गंगाजी के साथ कितनी निर्दयता कर रहा है – कितना गिना, गिनाया जाये। और अकेले सम्पत पर काहे उंगली उठाई जाये।😦

सांझ हो चली थी। हम लोग लौट चले कैथी से।

कैथी की सांझ
कैथी की सांझ

पण्डित छन्नू लाल मिश्र


उद्घाटन के लिये सजी मण्डुआडीह-जबलपुर एक्स्प्रेस
उद्घाटन के लिये सजी मण्डुआडीह-जबलपुर एक्स्प्रेस

शुक्रवार को आदेश हुआ कि मंडुआडीह (वाराणसी) से नयी चलने वाली 15117/15118 मंडुआडीह-जबलपुर एक्स्प्रेस के उद्घाटन के अवसर पर पूर्वोत्तर रेलवे के चार विभागाध्यक्षों को उपस्थित रहना है। चार थे – निर्माण संगठन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी श्री ओंकार सिंह, प्रमुख-मुख्य अभियन्ता श्री एच के अग्रवाल, मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक श्री अशोक लाठे और मैं। कोहरे और सर्दी का मौसम – उसमें बनारस तक चक्कर लगाना मुझे तो नहीं रुचा; और अधिकारियों को भी शायद ही रुचा हो। कोहरे के मौसम में नयी गाड़ी इण्ट्रोड्यूज़ करना मानो मलमास में शादी करना है। पर सरकार ये सब नहीं मानती। दूसरे कोहरा तो सिर्फ तराई पूर्वोत्तर में ही फैला है। विन्ध्याचल के उसपार तो मौसम साफ़ है। सतना के आगे तो यह गाड़ी कोहरे को चीर कर आगे बढ़ जायेगी।

रेल की नौकरी में वर्षा और कोहरे का समय मेरे लिये भयंकर दुस्वप्न रहा है। नजरिया बदलेगा – जब रेल यातायात की जिम्मेदारियों का सलीब कांधे से हट जायेगा। हटने में ज्यादा समय नहीं है!

खैर, हम, श्री लाठे, मैं और हमारे साथ दो अन्य अधिकारी चौरीचौरा एक्स्प्रेस से रवाना हुये गोरखपुर से। रात साढ़े दस बजे चलती है ट्रेन गोरखपुर से। उस दिन उसकी जोड़ी की ट्रेन लेट आई थी, तो कुछ लेट ही रवाना हुई। रास्ते में कोहरे में लेट होती गयी। लगभग तीन घण्टे लेट पंहुची शनिवार की सुबह वाराणसी। समारोह साढ़े इग्यारह बजे नियत था, इसलिये कोई हबड़ धबड़ नहीं थी। मेरे साथ चल रहे श्री लाठे कैरिज में सूर्यनमस्कार और अनेक प्रकार के बाबारामदेवियाटिक प्राणायाम कर रहे थे – इत्मीनान से। बाद में उन्होने इन आसन-प्राणायाम के लाभ भी बताये मुझे।

ट्रेन उद्घाटन के लिये सजाया मंच।
ट्रेन उद्घाटन के लिये सजाया मंच।

इत्मीनान से हम लोग तैयार हुये और लगभग 11 बजे पंहुच गये मंडुआडीह स्टेशन। स्टेशन के इलाहाबाद छोर पर मंच बना था। ट्रेन फूलों के बन्दनवार से सजी प्लेटफार्म पर लगी हुई थी। चार्ट डिब्बों पर पेस्ट थे और सरसरी निगाह डालने पर लगता था कि आधे से ज्यादा सीटें भरी हुई थीं अडवान्स रिजर्वेशन से। कुछ लोग इसे साप्ताहिक की बजाय रोजाना की गाड़ी बनाने की बात कहते दिखे प्लेटफार्म पर। पूर्वांचल बहुत बड़ा डिमाण्डक है सवारी रेल गाड़ियों का। यद्यपि कुछ समय से टिकट बिक्री में अपेक्षाकृत वृद्धि नहीं हो रही; पर उससे न तो जनता की नयी गाड़ियों की मांग करने में कमी आ रही है न नेताओं द्वारा उस प्रवृत्ति को हवा देने में। यात्रियों की संख्या के आधार पर कई गाड़ियां खत्म कर देनी चाहियें और कई रूट जहां वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में बेहतर सड़क मार्ग के विकल्प है‍, सेवाओं को तर्कसंगत बनाया जाना चाहिये। जीरो-बेस टाइम-टेबलिंग। पर उसके लिये चाहिये दृढ़ संकल्प। आने वाले समय में वह हो – शायद न भी हो।


पण्डित छन्नू लाल मिश्र, अकेले मंच पर।
पण्डित छन्नू लाल मिश्र, अकेले मंच पर।

समारोह स्थल पर सबसे पहले आये मुख्य अतिथि – पद्मभूषण पण्डित छन्नू लाल मिश्र। पण्डित जी वाराणसी सीट से नामांकन भरते समय श्री नरेन्द्र मोदी के प्रस्तावकों में से एक थे। निश्चय ही उनकी उपस्थिति से श्री मोदी के नामान्कन को गरिमा मिली होगी। आज नयी ट्रेन को भी वही गर्व मिलने जा रहा था। सबसे पहले आये तो उन्हे मंच पर बिठा दिया गया – आदर के साथ। लेकिन मंच पर वे अकेले थे और एक ऐसी विभूति को अकेले बैठे देख अजीब सा लगा। कोई छोटा नेता या अफसर भी यूं अकेले बैठा नहीं दीखता सार्वजनिक स्थल पर। कुछ ही देर बाद वाराणसी के महापौर रामगोपाल मौर्य भी आये और मंच पर एक से दो हुये। उसके बाद हम विभागाध्यक्षों को भी मंच पर बैठने का आदेश पूर्ण आग्रह हुआ। मैं पण्डित छन्नू लाल मिश्र जी के पीछे बैठा।

पण्डित छन्नू लाल मिश्र के पीछे बैठा था मैं। वहीं से आगे बैठे उनका चित्र।
पण्डित छन्नू लाल मिश्र के पीछे बैठा था मैं। वहीं से आगे बैठे उनका चित्र।

मंत्री महोदय की इंडिगो की फ्लाइट दिल्ली से देर से रवाना हुयी और उनके समारोह स्थल पर आने में देरी हुई। और समारोह नियत समय से एक घण्टा बाद प्रारम्भ हो पाया।

मंच पर बोलते पण्डित मिश्र।
मंच पर बोलते पण्डित मिश्र।

समारोह बहुत सधी चाल से चला। पण्डित छन्नू लाल मिश्र ने अपने सम्बोधन में रेल विषयक कविता का पाठ किया – कविता जैसी भी थी, पण्डित जी की आवाज तो मन को अन्दर से झंकृत कर देने वाली थी। लगभग उसी समय मेरे मित्र श्री गिरीश सिंह ने ह्वाट्सएप्प पर सन्देश दिया – भईया, हो सके तो पण्डित मिश्र से मिलकर उन्हे हमारा प्रणाम बोलियेगा। गिरीश से पूछना रह गया कि क्या वे उनसे व्यक्तिगत परिचय रखते हैं, पर मैने यह सोच लिया कि समारोह के बाद पण्डित जी से मिलूंगा जरूर।

ट्रेन के प्रस्थान पर शंखनाद करते ये सज्जन।
ट्रेन के प्रस्थान पर शंखनाद करते ये सज्जन।

ट्रेन को पण्डित मिश्र जी ने झण्डी दिखाई। अन्य उपस्थित होगों ने भी दिखाई। इस काम के लिये कई हरी झण्डियाँ उपलब्ध थीं। ट्रेन रवाना होते समय इंजन की हॉर्न की आवाज थी और मंच से एक गेरुआ वस्त्र धारी सज्जन शंखनाद कर रहे थे – क्या बुलन्द आवाज थी शंख की और कितनी देर अनवरत वे बजाते रहे सज्जन। बहुत मजबूत फेफड़े के आदमी होंगे वे। समारोह के बाद वे दिखे नहीं, अन्यथा उनसे उनके बारे में जानने का यत्न करता। वैसे, शंख बजवैय्या काशी में न होंगे तो कहां होंगे!

भाषण देते रेल राज्य मंत्री श्री मनोज सिन्हा।
भाषण देते रेल राज्य मंत्री श्री मनोज सिन्हा।

समारोह के समय गेट पर रोके गये कुछ डीजल कारखाना के कर्मचारी रेलवे के प्राइवेटाइजेशन की आशंका के कारण विरोध में नारे लगा रहे थे। मंत्री महोदय ने अपने भाषण में यह स्पष्ट किया कि रेल के निजीकरण की कोई योजना नहीं है। पर रेलवे को बहुत व्यापक निवेश की आवश्यकता है। यातायात की जरूरतें सात गुना बढ़ी हैं और रेल नेटवर्क दो गुना ही हुआ है। इस लिये, जो विरोध कर रहे हैं, उन्हे कड़ाई से निपटा जायेगा। मंत्री जी ने समारोह के बाद पत्रकारों-प्रतिनिधियों के प्रश्नों के उत्तर भी दिये।


समारोह के बाद मंच से उतर कर मैने पण्डित छन्नू लाल मिश्र जी को चरण छू कर प्रणाम किया और यह कहा भी कि मेरे मित्रवर ने मुझे इसके लिये आदेश दिया है। पण्डित जी मुझसे प्रसन्न लगे। उन्होने आशीर्वाद के लिये अपने जेब से इत्र की एक शीशी निकाल कर मेरे दांये हाथ पर इत्र मला। यह भी कहा कि काफी समय तक – दिन भर से ज्यादा उसकी सुगन्ध रहेगी। उन्होने महामृत्युंजय मंत्र का भी उच्चार किया मुझे आशीर्वाद देते हुये। मुझे इत्र लगाते देख कई और लोगों ने अपने हाथ बढ़ा दिये इत्र लगवाने को। बहुत ही सरल हृदय थे पण्डित जी। उन्होने किसी को भी निराश नहीं किया।

पण्डित छन्नू लाल मिश्र और मैं। उनके बांये हाथ में इत्र की शीशी भी जै जिससे उन्होने इत्र मेरे हाथ पर लगाया।
पण्डित छन्नू लाल मिश्र और मैं। उनके बांये हाथ में इत्र की शीशी भी जै जिससे उन्होने इत्र मेरे हाथ पर लगाया।

मेरे सहकर्मी श्री प्रवीण पाण्डेय ने पण्डित मिश्र के साथ मेरा चित्र भी लिया उस अवसर का। अपने आई-फोन से तुरंत ई-मेल भी कर दिया मुझे।

एक विभूति को प्रणाम करने और आशीर्वाद पाने के वे क्षण मेरे लिये सदैव स्मृति में रहेंगे। पता नहीं, आगे कभी पण्डित जी से मुलाकात होगी या नहीं – मैं न तो गायन विधा में दखल रखता हूं और न मुझे गीत-संगीत की समझ है। पर सरल, महान लोगों की महानता मुझे झंकृत करती है। उसी का परिणाम था कि मैं पण्डित जी से मिल पाया। वही भावना भविष्य में उनसे या उन जैसे लोगों से मिलवायेगी।


मुझे याद आता है आज से लगभग दो दशक पहले का समय। मैं रतलाम में अधिकारी था और उज्जैन से इलाहाबाद की यात्रा कर रहा था अपने घर आने के लिये। फर्स्ट क्लास के 4-बर्थर खण्ड में मैं और मेरा परिवार था और पास के कूपे में कवि श्री शिवम्ंगल सिंह ‘सुमन’ चल रहे थे। उनका भी श्रद्धावश जा कर मैने चरण स्पर्श किया था और मेरे बच्चों ने भी उनके पैर छुये थे। उन्होने भी हम से प्रसन्न हो कर मेरी बिटिया की कॉपी में कविता की दो पंक्तियां लिख कर दी थीं! … वे भी बहुत सरल हृदय व्यक्ति थे।

यूं ही, अचानक जीवन में मिल जाती हैं पण्डित छन्नू लाल मिश्र और श्री शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी जैसी विभूतियां और जीवन धन्य हो जाता है।

मैने गिरीश सिंह को फोन कर घटना के बारे में बताया। गिरीश ने बाद में ह्वाट्सएप्प में सन्देश दिया – जय हो! आनन्द आ गया आज तो। ज्ञान भैया ने कमाल कर दिया!

कमाल तो गिरीश के आग्रह ने किया था। अन्यथा मैं शायद पण्डित मिश्र जी से मिलने का विचार भी न करता।

मार्कण्डेय महादेव


वाराणसी वरुणा से असी तक का क्षेत्र है। काशी कहां से कहां तक है? उस दिन मैने गोमती के संगम पर मार्कण्डेय महादेव का स्थल देखा – उसे दूसरी काशी भी कहा जाता है। तब लगा कि काशी शायद गोमती से अस्सी तक का क्षेत्र हो।

यही वह क्षेत्र है जहां काशी के राजा दिवोदास ने अपनी पुत्रियों – अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका का स्वयम्वर किया था और भीष्म उनका अपहरण कर ले गये थे। कैथी ग्राम का क्षेत्र। अगर काशी अनेक बार बसी-बिगड़ी हो तो शायद यह काशी का प्रमुख क्षेत्र रहा हो कभी। वैसे भी, गंगा नदी की निर्मल धारा और स्थान का सौन्दर्य उसे एक अनूठी पवित्रता प्रदान करते ही हैं।DSC_1167

मैं अपने सहकर्मी प्रवीण पाण्डेय के साथ औंड़िहार-रजवाड़ी के बीच बनने वाले रेलवे के नये पुल को देखने जा रहा था। हम सवेरे वाराणसी से चले थे। रास्ते में प्रवीण ने सुझाया कि गंगा-गोमती के संगम स्थल को देखते चलें; जहां गंगा लगभग नब्बे अंश के कोण पर मुड़ती हैं। हमारे साथ उस खण्ड के यातायात निरीक्षक श्री अरुण कुमार सिंह थे। उन्होने बताया कि कैथी गांव है वह। वहां मार्कण्डेय महादेव का मन्दिर भी है। मन्दिर में रुचि नहीं बनी, पर गंगा-गोमती संगम और घाट के नाम से जो आकर्षण था, उससे हम घाट की ओर मुड़ लिये। “पहले गंगा निहार लें, फिर पुल देखने चलेंगे।”

गोमती संगम के बाद औंड़िहार के पार गंगा पूर्व की ओर नब्बे अंश का मोड़ लेती हैं।
गोमती संगम के बाद औंड़िहार के पार गंगा पूर्व की ओर नब्बे अंश का मोड़ लेती हैं।

लगभग ग्रामीण क्षेत्र। गंगा किनारे घाट भी कोई पक्का नहीं था। घाट पर टटरी लगी मचान नुमा दुकाने या पण्डा लोगों की चौकियाँ। कुछ औरतें नहा रही थीं, कुछ जमीन पर चूल्हा सुलगाये कड़ाही में रोट उतारने/लपसी बनाने का उपक्रम कर रही थीं। पास में ईन्धन के रूप में रन्हठा या सरपत की घास नजर आ रही थी।… लोग थे, उनमें उत्सव का माहौल था; न गन्दगी थी और न पण्डा-पुजारियों, गोसाईंयों की झिक झिक। और क्या चाहिये एक धर्मो-टूरिस्ट जगह में। हां, गंगा जी का वहां होना एक पुण्य़-दर्शनीय स्थान को अनूठा बेस-तत्व प्रदान कर रहा था। और गंगाजल भी पर्याप्त स्वच्छ तथा पर्याप्त मात्रा में।

ऐसी जगह जहां रहा जा सकता है। पर कौन कितनी जगह रह सकता है? यूं अगर काशी के समीप रहना हो तो यह दूसरी काशी बहुत सही जगह है। थोड़ी दूर पर गोमती नदी का संगम है और उसके आगे गंगा एक लगभग 90 अंश का टर्न लेती हैं। प्रवीण ने बताया कि वह स्थान भी बहुत रमणीय है। अगली बारी लगेगा वहां का चक्कर!DSC_1186

उम्र की फिसलपट्टी उतरता सीनियरत्व


मैने यह पोस्ट पोस्ट न की होती अगर मुझे प्रवीण की एक नई पोस्ट के बारे में सूचना देने की कवायद न करनी होती। यह पोस्ट ड्राफ्ट में बहुत समय से पड़ी थी। और अब तो काफी घटनायें गुजर चुकी हैं। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के काण्ड के लिये बापी महतो को पकड़ा जा चुका है (अच्छा हुआ, पकड़ गया, नहीं तो उसके कामरेड लोग समाप्त कर देते!)


प्रवीण पाण्डेय ने अपने ब्लॉग पर नई पोस्ट लिखी है – २८ घण्टे उसे पढ़ने के लिये आप उनके ब्लॉग पर जायें। यह पोस्ट पढ़ कर मुझे लगा जैसे नव विवाहित कवि हृदय गद्य में कविता लिख रहा हो –

… पर तुम्हारी आँखें मेरी ओर उस समय क्यों नहीं घूमी जब मैं चाह रहा था । तुम्हारी ओर देखते हुये तुम्हारे कन्धों को मोड़ना चाह रहा था अपनी ओर । लगता है, मेरी आँखों में अब वह बल नहीं रहा जो खींच ले तुम्हारी दृष्टि, अचानक, बलात, साधिकार ।

मुझे व्यग्रता है कि तुम्हारी आँखों ने मेरी आँखों की अवहेलना कर दी ।

मेरा प्रेम रोगग्रसित है । पहले तो अवहेलना व अधिकार जैसे शब्द नहीं आते थे हमारे बीच । पर पहले तो तुम्हारी आँखें हमेशा मेरी ओर ही मुड़कर देखती थी और मेरी यात्राओं को यथासम्भव छोटा कर देती थी ।…


Oct05 009 सरकारी नौकरी में सीनियॉरिटी समय से पक कर मिलती है। जब जूनियर होते हैं, तो घर जूनियॉरिटी के हिसाब से छोटे मिलते हैं। उस समय छोटे बच्चों के साथ ज्यादा स्पेस – यानी बड़े घर की दरकार होती है। पक कर सीनियर बनने पर बाल बच्चे किनारे लग गये होते हैं, तब बड़े घर मिलते हैं – बड़े बंगले। और वे इतने बडे लगते हैं कि उनके अधिकांश भाग पर भूत इत्मीनान से रहते होंगे – बिना मकान किराया दिये।

सरकारी नौकरी के बाहर देखता हूं तो पाता हूं कि सीनियरत्व उम्र की फिसलपट्टी तेजी से उतरता जा रहा है। तीस – पैंतीस का व्यक्ति सीनियर हो ले रहा है। चार पांच नौकरियां फलांग चुका होता है। बड़े झक्कास पदनाम युक्त होता है। बैंक बैलेंस भी इतना होता है, जितना हमारी इतने साल की नौकरी में न हुआ! हमारी पीढ़ी सीनियरता को पेड़ पर लगे कटहल की तरह धीमे पकाने में नष्ट हो गयी। और अब लोग सीनियरता लीची की तरह पकाने लगे हैं!

Gyan670 अखबार में हेडलाइन्स देखी कि ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के काण्ड को सीनियर माओवादी ने हरी झण्डी दी थी। जिज्ञासा वश खबर पढ़ी तो पता चला कि यह सीनियर माओवादी, कोई जयन्त नामधर्मी व्यक्ति उन बैठकों की अगुआई कर रहा था, जिनमें यह तय हुआ था कि रेलगाड़ी गिराई जाये।

इस जयन्त की उम्र भी लिखी थी – बाईस साल! सन २००३ में वह भर्ती हुआ था नक्सल आंदोलन में; पन्द्रह साल का था तब। अब वह सीनियर हो चला है। जयन्त जी ने रेल गिराई/गिरवाई हो – यह तो जांच तय करेगी। हमें तो मात्र उसकी उम्र और उसकी सीनियॉरिटी से लेना देना है! जाम्बी थाना  के अमचूरिया गांव के जयन्त की सीनियॉरिटी को देख ईर्ष्या है। रेल चलाने में सीनियॉरिटी हमें इतने समय बाद मिली और रेल गिराने में सीनियॉरिटी जयन्त मात्र बाईस वर्ष की उम्र में पा गये!

सच में, एक शानदार फिसलपट्टी पा गया है सीनियरत्व!