रमेश कुमार जी के रिटायरमेण्ट अनुभव


श्री रमेश कुमार, मेरे अभिन्न मित्र। जिन्होने अपना चित्र भेजने के लिये पहली बार अपना सेल्फी लिया!
श्री रमेश कुमार, मेरे अभिन्न मित्र। जिन्होने अपना चित्र भेजने के लिये पहली बार अपना सेल्फी लिया!

रमेश कुमार जी मेरे अभिन्न मित्रों में से हैं। हम दोनों ने लगभग एक साथ नौकरी ज्वाइन की थी। दोनो केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण में असिस्टेण्ट डायरेक्टर थे। कुंवारे। दिल्ली के दूर दराज में एक एक कमरा ले कर रहते थे। घर में नूतन स्टोव पर कुछ बना लिया करते थे। दफ़्तर आने के लिये लम्बी डीटीसी की यात्रा करनी पड़ती थी – जो अधिकांशत: खड़े खड़े होती थी।

क्लास वन गजटेड नौकरी लगने पर जो अभिजात्य भाव होता, वह नौकरी लगने के पहले सप्ताह में ही खत्म हो चुका था। याद है कि जब एक मित्र ने बताया था कि वह अपने लिये मकान खोजने निकला तो मकान मालिक ने गजटेड नौकरी की सुन कर कहा था – “नो, यू पेटी गवर्नमेण्ट सरवेण्ट काण्ट अफ़ोर्ड दिस अकॉमोडेशन” ( नहीं, तुम छुद्र सरकारी कर्मचारी इस मकान का किराया भर नहीं पाओगे)।

खैर हम दोनों में कोई बहुत एयर्स नहीं थी सरकारी अफसरी की – न उस समय और न आज।
कालान्तर में मैं रेलवे की यातायात सेवा ज्वाइन कर दिल्ली से चला आया पश्चिम रेलवे में, पर रमेश जी केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण में ही रहे। उसी सेवा में उन्होने कुछ वर्ष पावर ग्रिड कार्पोरेशन की डेप्यूटेशन पर इलाहाबाद में काटे। उस समय मैं भी वहां पदस्थ था उत्तर-मध्य रेलवे में। एक जगह पर होने के कारण पुरानी मैत्री पुन: प्रगाढ़ हो गयी। वह प्रगाढ़ता आज भी बनी है।

रमेश जी रिटायर हुये इसी साल जून के महीने में। मैं सितम्बर में होने जा रहा हूं। वे इलाहाबाद और दिल्ली के बीच रहते हैं। अधिकांशत: इलाहाबाद। मैं इलाहाबाद और वाराणसी के बीच रहूंगा – अधिकांशत: कटका में। ज्यादा दूरी नहीं रहेगी। वैसे भी; मैं इलाहाबाद-वाराणसी के बीच एक मन्थली सीजन टिकट का पास बनवाने की सोच रहा हूं – जिससे इलाहाबाद आना जाना होता रहेगा। उनसे सम्पर्क भी बना रहेगा।

उस रोज रमेश जी से बात हो रही थी। अपने रिटायरमेंण्ट के बाद के लगभग ढाई महीने से वे काफ़ी प्रसन्न नजर आ रहे थे। मैने उनसे कहा कि ऐसे नहीं बन्धु, जरा अपना अनुभव ह्वाट्सएप्प पर लिख कर दे दो। उसे मैं भविष्य के लिये ब्लॉग पर टांग दूं और हां, एक चित्र – सेल्फी भी जरूर नत्थी कर देना।

इस तरह के काम में रमेश कुमार मुझसे उलट काफी सुस्त हैं। खैर, मैत्री का लिहाज रखते हुये एक दो मनुहार के बाद उनका लिखा मुझे मिल गया और थोड़ी और मनुहार के बाद सेल्फी भी।

अपनी कहता रहूं तो रमेश जी के साथ जो जीवन गुजारा है – उसपर एक अच्छी खासी पुस्तक बन सकती है। सुख और दुख – दोनों में बहुत अन्तरंग रहे हैं वे। पर यहां उनका ह्वाट्सएप्प पर लिखा प्रस्तुत कर दे रहा हूं।अन्ग्ररेजी से हिदी अनुवाद के साथ।

रमेश लिखते हैं –

आज आपसे बात कर बहुत प्रसन्नता हुई। मेरे ख्याल से आप 30 सितम्बर की काफ़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे होंगे। पिछले दो महीने से अधिक से मैं अपनी रिटायर्ड जिन्दगी पूरी तरह एन्ज्वॉय कर रहा हूं। मैं किसी अनुशासित दिनचर्या पर नहीं चल रहा (सिवाय नित्य सवेरे की सैर और यदा-कदा शाम की सैर के)। मैं पढ़ता हूं – करीब तीन-चार समाचारपत्र और जो हाथ लग जा रहा है (इस समय एक से अधिक पुस्तकें पढ़ रहा हूं) तथा बागवानी करता हूं। मुझे पक्का यकीन है कि आपके पास ढेरों अपठित पुस्तकें होंगी। अब समय आ रहा है कि उनके साथ न्याय किया जाये। और आपको तो लिखने में रुचि है – आपके पास तो अवसर ही अवसर हैं अब।

मैं संगीत सुनता हूं और अब सीखने का भी प्रयास करने लगा हूं। मैं किसी न किसी प्रकार से समाज सेवा भी करना चाहता हूं – यद्यपि उसके बारे में विचार पक्के नहीं किये हैं।

मेरा डाईबिटीज़ कण्ट्रोल में है। मेरी HbA1C रीडिंग 7.3 से घट कर 6.5 हो गयी है। मुझे पक्के तौर पर नहीं पता कि यह चमत्कार कैसे हुआ, पर निश्चय ही रिलेक्स जिन्दगी, समय की किसी डेडलाइन को मीट करने की अनिवार्यता न होना, आफिस का तनाव घर पर न लाने की बात ने सहायता की है। कुल मिला कर मुझे जो करने का मन है, वह कर रहा हूं। मेरे ख्याल से हर आदमी यही चाहता है।

अगर पैसा कमाने की कोई बाध्यता नहीं है ( सरकार सामान्य और सन्तुष्ट जीवन जीने के लिये पर्याप्त दे देती है) और अगर स्वास्थ्य के कोई बड़े मुद्दे नहीं हैं तो अनेकानेक सम्भावनायें है जीवन को आनन्द से व्यतीत करने की, रिटायरमेण्ट के बाद। आप अपनी सुनें और तय करें।

मुझे बहुत उत्सुकता है आपके नये ’आशियाने’ को देखने की कटका में। ज्यादा आनन्द के लिये हंस-योग का प्रयास करें।

सस्नेह,
रमेश कुमार।


रमेश कुमार जी ने हंस-योग का नाम लिया अन्त में। इसके विषय में उनसे पूछना रह गया। सम्भवत: वे स्वामी परमहंस योगानन्द या उनसे सम्बद्ध किसी योग (क्रिया योग?) की बात कर रहे हैं। शायद उनका आशय यह है कि मैं किसी योग-प्राणायाम आदि की ओर अपना झुकाव बनाऊं।

देखता हूं, आगे क्या होता है। अभी तो मन सूर्योदय को गंगा की बहती धारा में झिलमिलाते देखने को ही ललचा रहा है! बस!


 

पिताजी और यादें


संझा में बरामदे में बैठे, बतियाते पिताजी।
संझा में बरामदे में बैठे, बतियाते पिताजी।

शाम को घर के बरामदे में कुर्सी डाल हम बैठे थे – पिताजी, पत्नीजी और मैं। बात होने लगी पिताजी के अतीत की।

डिमेंशिया है पिता जी को। हाल ही की चीजें भूल जाते हैं। पुराना याद है। आवाज धीमी हो गयी है। कभी कभी शब्द नहीं तलाश पाते विचार के लिये। जब समझ नहीं आता तो हमें दो-तीन बार पूछना पड़ता है। यह सब फुरसत में ही हो पाता है। शाम को बरामदे में बैठे यह सम्भव है – जब समय की हड़बड़ी नहीं होती।


सन 1934 के जन्मे हैं मेरे पिताजी। गांव शुक्लपुर, तहसील मेजा, जिला इलाहाबाद। सामान्य सा गांव है शुक्लपुर। नाम शुक्लपुर है पर घर पाण्डेय लोगो के हैं। एक आध घर ही होगा शुक्ल लोगों का। गांव से गंगाजी 3 किलोमीटर की दूरी पर हैं। गांव में और आसपास के गांवों में खेत हैं हम लोगों के। कुछ बगीचे हैं – जिनके पेड़ पुराने हो कर खत्म हो रहे हैं। नये लगाये ही नहीं जा रहे। अब अलगौझी के कई दौर होने के कारण हर एक के हिस्से जमीन बहुत कम हो गयी है। घर का बड़ा मिट्टी का मकान था। करीब आधा बीघा जमीन पर। सौ साल से ज्यादा चला। हम लोग उसकी मरम्मत की सोच रहे थे। पर करीब तीन साल पहले उसे ढहा कर नया बनाने की सोची गयी। ढहा तो दिया गया, पर नया बनाने की बात पर एका नहीं हो पा रहा। गांव को लोग दुहना चाहते हैं – उसे सम्पन्न कोई नहीं करना चाहता।

चारदीवारी ले अन्दर एक बड़ा अहाता था, उसमें नीम का पेड़ था। नीम अब नहीं है।
शुक्लपुर का हमारा कुटुम्ब का मकान। अब नहीं है। 

गांव से करीब 8 किलोमीटर दूर है सिरसा। बाजार है। मेरे प्रपितामह के छोटे भाई प. आदित्यप्रसाद पाण्डेय वहां वैद्यकी करते थे। पहले बनिया लोगों के किराये पर लिये मकान में रहते थे। फिर वहीं जमीन खरीद कर मकान बनाया। वह पुराना मकान अब भी है। पर उसी साथ नया भी बना लिया है उनके पुत्र श्री तारकेश्वर नाथ पाण्डेय ने। प. आदित्यप्रसाद आयुर्वेद में आचार्य भी थे और नाड़ी-वैद्य भी। श्री तारकेश्वर जी ने उनका दवाखाना आगे चलाया। वे कुछ अपने पिताजी से सीखे, कुछ होमियोपैथी की डिग्री ले कर हासिल किया। चिकित्सालाय उनका भी अच्छा चलता रहा है।

यहां पिताजी की यादें मूलत: इन्ही स्थानों और परिवेश की हैं।


पिताजी ने बताया कि गांव का मकान लगभग तब का था जब मालिक (मेरे बब्बा प. महादेवप्रसाद पाण्डेय जन्मे होंगे या कुछ छोटी उम्र के रहे होंगे। मेरे बब्बा का जन्म 1900 में हुआ था। वह मकान मेरे पर-बाबा प. हरिभूषण पाण्डेय ने बनवाया था। अलगौझी के बाद। सिरसा में वैद्य जी ने किराये पर मकान ले वैद्यकी करते हुये वहां बनिया लोगों से जमीन खरीद कर घर बनाया। पैंतीस सौ रुपये में खरीदी थी वह जमीन। बाद में घर के पीछे की जमीन भी किसी मुसलमान से खरीदी और घर का क्षेत्रफल बढ़ाया।

इण्टर की पढ़ाई मेरे पिताजी ने वैद्य जी के पास रहते हुये सिरसा में की।  सिरसा की यादें बताते हुये उन्होने कहा कि वह आजादी के समय का दौर था। गान्धी-नेहरू-विजयलक्ष्मी पण्डित आदि लोग वहां आते रहते थे। महामना मदन मोहन मालवीय जी भी आते थे। मालवीय जी और गान्धीजी में बनती नहीं थी। उन्होने एक फोटो देखी है जिसमें गान्धीजी मालवीय जी का हाथ पकड़ कर मंच पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। नहीं तो दोनो एक साथ कम ही होते थे।

उन्हे याद है कि गान्धीजी सिरसा में करीब तीन-चार बार आये थे। नेहरू-विजयलक्ष्मी-कैलाशनाथ काटजू आदि तो आते रहते थे। शास्त्रीजी तो बहुत ही आया-जाया करते थे।

“एक बार नेहरू जी और विजयलक्ष्मी पण्डित शुक्लपुर  आये। उस जमाने में कोई गाड़ी नहीं होती थी। एक पुरानी कार का इंजतजाम हुआ था उन्हे लाने के लिये। भरत सुकुल का लड़का नन्दकिशोर कलकत्ता में कुछ गाड़ी चलाना सीखा था। उसी को जिम्मा दिया गया चलाने को। पर उससे पुरानी कार हड़हड़ाई बहुत, चली नहीं।” :-) 

“विजय लक्ष्मी पण्डित से मिलने सुकुलपुर में गांव की कई औरतें आयीं। त्रिभुअन की माई विजयलक्ष्मी का पैर छूने लगी तो उम्र के लिहाज से विजयलक्ष्मी जी ने ही उनका पैर छू लिया। त्रिभुअन की माई कहने लगी – ल बहिनी हम त तोहार गोड़ छुअई आइ रहे, तू हमरई छुई लिहू (लो बहिन, मैं तो तुम्हारा पैर छूने आई थी, तुमने तो मेरा ही छू लिया)।”

“उस समय आजादी, देश, राजनीति के बारे में गांव में जागरूकता थी। लोग पढ़े-लिखे कम थे, पर इन सब पर चर्चा करते थे। औरतें जो परदा में रहती थीं, भी बाहर गांव में जुलूस में निकला करती थीं। लोगों में स्वार्थ कम था; जागरूकता अधिक थी।”

“सिरसा में हम गंगा नहाने जाते थे – लगभग रोज। घर में कोई तैराक नहीं था। वैद्य जी भर कुछ तैरना जानते थे। नदी पार करने के लिये पॉण्टून वाला पुल नहीं हुआ करता था (वह तो आज से पच्चीस साल पहले बनने लगा)। लोग या तो डोंगी से पार जाते थे सैदाबाद की ओर या झूंसी वाले पुल से आवागमन होता था।”

“वैद्य जी विद्वान थे। पैसे का लोभ नहीं था उन्हे। बहुतों की निशुल्क चिकित्सा करते थे। पैदल जाते थे मरीज देखने। दूर जाना होता था तो लोग इलाज करवाने पालकी में ले जाते थे। सिरसा में न्योता (भोज) का बहुत चलन था। वैद्यजी न्यौता पर नहीं जाते थे। हम लोगों को जाने को कहते थे। जब कोई नहीं जाता था तो भोजन घर पर ही भेज देते थे लोग।”

खास बात यह थी कि वैद्यजी और मालिक (मेरे पिताजी के पिताजी) कभी झूठ नहीं बोलते थे।

“वैद्य जी का पहले कम्पाउण्डर था शीतला। वह कुशल हो गया था। दवा भी करना जान गया था। उसे बाद में कपारी (?) हो गयी थी। उसी से मर गया। उसके बाद गंगा कम्पाउण्डर बना। जात का नाऊ था। वह भी बहुत दक्ष हो गया था।”

पिताजी टुकड़ों में बताते हैं – जैसे याद आता है। प्रश्न करने पर सोच कर उत्तर देते हैं। मैने पाया कि प्रश्न करना और उनके कहे को नोट करना उन्हे अच्छा लगता है। सोचता हूं कि भविष्य में इस तरह बैठने-सुनने का अवसर अधिक मिलता रहेगा।

पिताजी की पुरानी याद पर एक पोस्ट – एक कस्बे में १५ अगस्त सन १९४७ 


DEMU – डेमू गाड़ी का उद्घाटन समारोह


सादात में डेमू उद्घाटन के दौरान भीड़ को सम्बोधित करते श्री मनोज सिन्हा।
सादात में डेमू उद्घाटन के दौरान भीड़ को सम्बोधित करते श्री मनोज सिन्हा।

अपनी रेल सेवा के दौरान मैने कई ट्रेनों के शुभारम्भ के समारोह देखे हैं। बहुतों में बहुत सक्रिय भूमिका रही है। इन्दौर से देश के विभिन्न भागों में जाने वाली लगभग आधा दर्जन ट्रेनों का शुभारम्भ, अलग-अलग रेल मन्त्रियों द्वारा होते देखा है। माधव राव सिंधिया, नीतिश कुमार, ममता बैनर्जी, लालू प्रसाद यादव के समारोहों की यादें हैं। ये तब के अवसर हैं जब मैं रेल मण्डल स्तर का अधिकारी हुआ करता था। उसके बाद जोनल रेलवे के मुख्यालय – पूर्वोत्तर और उत्तर मध्य रेलवे के मुख्यालयों में आने पर (मेरे कार्य की प्रकृति बदलने के कारण) – ट्रेनों के उद्घाटन समारोहों में जाने का सिलसिला लगभग समाप्त हो गया था।

हाल ही में पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य परिचालन प्रबन्धक बनने पर यह उद्घाटन समारोहों में जाने का सिलसिला पुन: कुछ प्रारम्भ हुआ। रेल राज्य मन्त्री श्री मनोज सिन्हा ने मण्डुआडीह (वाराणसी) से दो ट्रेनों को हरी झण्डी दिखाई। उन समारोहों में मैं उपस्थित था।

अब, तीस जून को एक ट्रेन के उद्घाटन समारोह में जाने का अवसर मिला। यह अलग प्रकार की रेलगाड़ी थी और अलग प्रकार के जगह पर उसका उद्घाटन हो रहा था।

मऊ से बरास्ते वाराणसी, इलाहाबाद सिटी को जाने वाली एक डीजल-इलेक्ट्रिक-मल्टीपल-यूनिट (DEMU) सवारी गाड़ी – जो सभी स्टेशनों पर रुकती है – के शुभारम्भ का कार्यक्रम था यह। माननीय  रेल राज्य मन्त्री श्री मनोज सिन्हा उसका उद्घाटन करने जा रहे थे। उद्घाटन किसी प्रमुख नगर – इस मामले में मऊ, इलाहाबाद या वाराणसी – में न हो कर एक छोटे स्टेशन सादात में होने जा रहा था। एक प्रकार से यह सही भी था – छोटे स्टेशनों की जरूरतों को पूरा करने वाली ट्रेन का उद्घाटन भी एक छोटे स्टेशन पर हो।

सादात स्टेशन पर बनारस से सड़क मार्ग से हम घूम-घाम कर पंहुचे। पहले आशापुर-पांड़ेपुर के आस पास ट्रैफिक जाम में फंसे रहे पौना घण्टा। एक बस और एक टैंकर वाले आमने सामने भिड़े हुये थे। कोई अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रहा था। अंतत:, समय से थक हार कर दोनो शायद थोड़ा थोड़ा पीछे हटे और हमें निकलने का मौका मिल गया। अन्यथा लगने लगा था कि उद्घाटन कार्यक्रम में चूक जी जायेंगे हम। सड़क आगे अच्छी मिली। सैदपुर के आसपास हम गंगा नदी के पास से गुजरे। वहां का दृष्य देख कर लगा कि लौटानी में कुछ समय गंगा किनारे व्यतीत करना उचित रहेगा। वही बाद में किया भी।

मुख्य सड़क से सादात स्टेशन को पंहुचने का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा था। टेढ़ा-मेढ़ा और कहीं कहीं संकरा भी। लोग हमें कौतूहल से देख भी रहे थे। कहीं कहीं झोंपड़ियां और गुमटियां थीं तो बीच में इक्का-दुक्का पक्के मकान (जिन्हे शहर के स्तर से भी आलीशान कहा जा सकता है) भी थे। मुझे लगने लगा था कि यह पक्का सामंती इलाका है – जहां गरीबी और पिछड़ेपन के बीच सम्पन्नता के द्वीप हैं। मुझे यह भी बताया गया कि इस इलाके में कई कॉलेज हैं और वहां के छात्र बहुत उत्पाती हुआ करते थे। पहले जब यहां लाइन क्लियर लेने के लिये टोकन की व्यवस्था थी तो ट्रेने ज्यादा देर तक रोकने के लिये वे रेलवे स्टाफ से टोकन छीन कर फैंक दिया करते थे। अब भी यहां चेन खींचने की घटनायें आम से अधिक हैं।


अगले दिन मुझे मेरे साले जी – शैलेन्द्र दुबे ने बताया कि यह इलाका समाजवादी पार्टी का गढ़ हुआ करता था। श्री मनोज सिन्हा ने वह इस बार संसदीय चुनाव में जीत हासिल कर वह गढ़ ध्वस्त कर दिया। सादात के इलाके से श्री सिन्हा को व्यापक समर्थन मिला। इस भाग में लगभग क्लीन स्वीप मिली उन्हे।


अंतत: हम समय से रेलवे स्टेशन पंहुच ही गये। डेमू ट्रेन सजी, संवरी अपने इनॉग्युरल रन के लिये प्लेटफार्म पर तैयार खड़ी थी। सादात स्टेशन पर प्लेटफार्म के ऊंचा करने का काम चल रहा है। उसके कारण व्यवधान था। व्यवधान पिछले दिनों हुई बारिश के कारण भी था। पर उसके बावजूद बहुत से स्थानीय उस ट्रेन को देखने के लिये वहां उपस्थित थे। कुछ तो नाच भी रहे थे।

उद्घाटन के लिये सजी डेमू सवारी गाड़ी। सादात स्टेशन पर।
उद्घाटन के लिये सजी डेमू सवारी गाड़ी। सादात स्टेशन पर।

स्टेशन के सामने पण्डाल बना था। पूरे पण्डाल स्थल पर कारपेट बिछा था। बिछाना वैसे भी जरूरी हो गया था – बारिश के कारण अगर कारपेट न होता तो चलना कठिन होता। पण्डाल, शामियाना और मंच की गुणवत्ता सादात जैसे छोटे स्टेशन की तुलना में काफी अच्छी कही जायेगी।

मंत्री महोदय समय पर आये। उन्हे देख कर भीड़ में जो रिस्पॉंस दिखा, वह एक नेता के क्षेत्र में औपचारिक दौरे जैसा नहीं था। लगभग हर व्यक्ति उन्हे ऐसे देख रहा था या उन्हे ऐसे सम्बोधित कर रहा था मानो श्री सिन्हा उसी के खासमखास हों। वे हर व्यक्ति से उसका ज्ञापन स्वयम ले रहे थे। वह जो कह रहा था उसे सुन भी रहे थे और उसके कहे पर आश्वासन और प्रतिक्रिया भी दे रहे थे। … मुझे दशकों पहले माधव राव सिन्धिया जी के कार्यक्रम की याद हो आयी। वहां तीस-चालीस कदम की दूरी रखी जा रही थी भीड़ की उनसे और एक दो व्यक्ति लोगों से ज्ञापन ले कर तह लगाने के बाद एक बोरी में इकठ्ठा कर रहे थे। शायद सिन्धिया जी श्रीमंत थे जिनके लिये लोगों से सम्बन्ध राजा-प्रजा वाले थे; और, उसके उलट सिन्हा जी जमीन से जुड़ी राजनीति कर रहे थे।

समारोह के दौरान जनता से बोलते-बतियाते श्री मनोज सिन्हा।
समारोह के दौरान जनता से बोलते-बतियाते श्री मनोज सिन्हा।

मैं मन्त्री महोदय के पीछे बैठा था और उनका जनता के साथ इण्टरेक्शन बड़ी बारीकी से देख रहा था। अपने ब्यूरोक्रेटिक जीवन में दो दर्जन से अधिक सांसदों और मांत्रियों को बारीकी से देखा है मैने। अपने समधी (गिरिडीह के लोक सभा सदस्य, श्री रवीन्द्र पाण्डेय) के साथ भी समय व्यतीत करने का पर्याप्त अनुभव है। मैने इन अधिकांश नेताओं को अच्छी ग्रास्पिंग पावर का पाया था। उनका जनता और भीड़ को देख ‘हरियरा जाना’ भी मैने ऑब्जर्व किया है। पर जनता का उनको देख कर इस प्रकार प्रसन्न होना – जैसा यहां समारोह में देख रहा था – कम ही (या शायद नहीं ही) देखा है मैने।

इस लिये, समारोह के बाद जब मंत्री महोदय के साथ कुछ क्षण गुजारने का समय मिला; तब मैने यह कहा भी – “बहुत आत्मीय भीड़ थी। बहुत भारी संख्या में और बहुत आत्मीय।”

इस प्रकार के छोटे स्टेशन पर उद्घाटन समारोह का आयोजन करना रेलवे प्रशासन के लिये झंझटिया काम हो सकता है। शायद कुछ लोग कुड़बुड़ा भी रहे हों और इसे सामान्य प्रक्रिया के विपरीत बता रहे हों। पर अगर लोगों का सही रिस्पॉंस ही एक घटक हो समारोह का; तो यह सादात में (छोटे स्टेशन पर) समारोह को मैं सम्भवत: सब से अच्छा समारोह मानूंगा अपने करीयर में।

इस इलाके को डेमू सेवा देना और उसका उद्घाटन सादात जैसे स्टेशन से करना अगर श्री मनोज सिन्हा की स्थानीय टीम के सोच के बल पर हुआ है, तो मानना पड़ेगा कि उनके पास एक कुशल राजनीतिक-प्रबन्धन की टीम है। और अगर यह उनका अपना तय किया था, तो उनके राजनीतिक प्रबन्धन को मास्टर-स्ट्रोक लगाने वाला ही कहा जायेगा।

ग्रामीण जनता का दिल जीतने के लिये डेमू बेहतर है लम्बी दूरी की गाड़ी से। छोटा कदम बेहतर है अंतर महानगरीय छलांगों की अपेक्षा!


कउड़ा


कउड़ा
कउड़ा

आज तीसरा दिन था, घाम नहीं निकला। शुक्रवार को पूरे दिन कोहरा छाया रहा। शीत। शनीचर के दिन कोहरा तो नहीं था, पर हवा चल रही थी और पल पल में दिशा बदल रही थी। स्नान मुल्तवी कर दिया एक दिन और फ़ेसबुक पर लिखा – और भी गम हैं जमाने में नहाने के सिवा।

आज रविवार को पिछले दो दिन से बेहतर था। फिर भी धूप नहीं निकली और घर के अन्दर पिताजी की चारपायी के बगल में सिगड़ी जलती रही। मौसम की अनप्रेडिक्टेबिलिटी देख कर पिताजी पहले ही कह चुके हैं – भगवान पगलाई ग हयेन् (भगवान पगला गये हैं)।

शिवचन्द – हमारा घरेलू भृत्य – पिताजी की चारपाई के बगल में रखी सिगड़ी में कोयला डालने का काम मुस्तैदी से करता है। कितना कोयला बचा है – इसका भी हिसाब उसके पास है। इस सर्दी में करीब बीस सेर लकड़ी का कोयला लग चुका है कमरा गरम रखने में।

पिताजी की चारपाई के बगल में रखी सिगड़ी
पिताजी की चारपाई के बगल में रखी सिगड़ी

आज शिव चन्द ने बताया – पिछवां कउड़ा बारे हई। (पीछे अलाव जलाया है)। बंगले की एक बीघा जमीन में कई पेड़ हैं और कई सूखे हुये भी। आम-अमरूद-सेमल की गिरी डालियां और ठूंठ पीछे आउट हाउस वाले ले जा कर जला रहे हैं सर्दी से बचाव के लिये। वह लकड़ी घर के अन्दर अलाव के रूप में नहीं जलाई जा सकती। उससे धुआं बहुत होता है। पर खुले में अलाव जला कर उसे तापा जा सकता है।

मैने जा कर देखा। हवा और गलन कम होने के कारण घर के पिछवाड़े बाहर बैठा जा सकता था। कुर्सियां निकलवा कर मैं भी वहां बैठा। मेरे बाद मेरी पत्नीजी भी आयीं और उसके बाद पिता जी भी। धुआं हवा के साथ साथ अपनी दिशा बदल रहा था और कुर्सी बार बार खिसकानी पड़ रही थी मुझे। लकड़ियां अच्छी जल रही थीं और उनकी आंज जब बढ़ जाती थी तब अलाब से पीछे भी खींचनी पड़ती थी कुर्सी। लकड़ियों के आग में चटकने की आवाज के अलावा गर्मी से उनके पास हवा भांति भांति की आवाज निकालती थी। कउड़ा की राख छोटे छोटे टुकड़ों में मेरे कपड़ों और हाथ में ली गयी किताब पर गिरती थी।

कउड़ा का अनुभव बचपन का है। गांव में सूखी लकड़ी और पत्तियों का प्रयोग कर जलाया जाने वाला अलाव और उसके इर्दगिर्द जमा लोगों की बत कही। आज कउड़ा था पर बतकही नहीं। मेरे हाथ में किताब थी – जिसमें लेखक ग्वाटेमाला और अल सल्वाड़ोर की रेल यात्रा का विवरण दे रहा था। ग्वाटेमाला का सत्तर के दशक का दृष्य। भूकम्प पीड़ित निहायत उदास, विपन्न, गरीब और अपने आप में अजनबी देश। जिसमें लोग बाहरी से तो क्या, अपने लोगों को भी निहायत शक की नजर से देखते थे। गन्दगी थी और मक्खियां। एक औरत ट्रेन में एक ही कप में पूरे कम्पार्टमेण्ट भर को कॉफी पिला रही थी और लोगों को कोई आपत्ति न थी। मुझे एक बारगी लगा कि लेखक नाहक उस जगह रेलगाड़ी से सफ़र कर रहा था। पर असल में ट्रेवलॉग का मतलब टूरिस्ट की तरह यात्रा कर उसका विवरण लिखना नहीं होता। अगर वह ग्वाटेमाला में इस तरह यात्रा नहीं करता, नहीं लिखता तो मुझे या मुझ जैसे पाठक को भूकम्पों से पीड़ित उस देश की विपन्न दशा का क्या अन्दाज होता।

कउड़ा, रामबचन (बायें) और शिवचन्द
कउड़ा, रामबचन (बायें) और शिवचन्द

मैं सोचने लगा कि मैं भी धीमे चलने वाली पैसेन्जर ट्रेनों में पूर्वान्चल की यात्रा कर जनता की नब्ज देखूं – गोरखपुर से नरकटिया, समस्तीपुर, रक्सौल, मुजफ़्फ़रपुर, सोनपुर, छपरा, सिवान, पडरौना… फिर मुझे लगा कि न मेरे पास पॉल थरू जैसे लेखनी है न उस तरह यात्रा करने की सन्कल्प शक्ति। रेलवे की नौकरी के दौरान बिना लम्बी छुट्टी लिये उसतरह की यात्रा वैसे भी सम्भव नहीं।

लेखक यात्रा करता सान् सल्वाड़ोर पंहुंच कर वहां एक (हिंसक) फुटबाल मैच का विवरण दे रहा था। कउड़ा धीमा हो गया था। राम बचन – मेरे आउट हाउस में रहने वाला जवान जो रेलवे मैकेनिकल वर्कशॉप में काम करता है और रविवार होने के कारण घर पर था – और लकड़ियां ला कर कउडा तेज करने लगा। आग और धुआं बढ़ गये। पुस्तक का भी एक अध्याय पूरा होने को आया। मैं वह अध्याय पूरा कर घर के अन्दर चला आया। संझा के समय जब लेखक आगे निकारागुआ की यात्रा में निकलेगा और यहां घर में अगर शीत न गिरने लगा तो एक बार फिर कउड़ा के पास बैठने की सोचूंगा। अन्यथा कल तो सोमवार है। फिर सप्ताह भर छुट्टी न मिलेगी कउड़ा के पास बैठने को।DSC_0059