अखिल भारतीय हिन्दी ब्लॉगिंग सम्मेलन, शिवकुटी, इलाहाबाद


अखिल भारतीय हिन्दी ब्लॉगिंग सम्मेलन हुआ, काहे से कि इसमें यूपोरियन और कलकत्तन प्रतिनिधित्व था। और कई महान ब्लॉगर आ नहीं पाये। उन तक समय से निमन्त्रण नहीं पंहुच पाया। मच्छर भगाने के लिये हाई पावर हिट का प्रयोग किया गया था। वातानुकूलित कमरे की व्यवस्था थी, पर जाड़ा शुरू होने के कारण बिजली का खर्चा बचा लिया गया।

कुल दो लोग थे। बोलें तो वरिष्ठ। इनमें शिवकुमार मिश्र तो महान ब्लॉगर हैं। आशा है कि वे मुझे टिप्पणी में महान बतायेंगे।

इन्होने हिन्दी ब्लॉगिंग के भूत वर्तमान भविष्य पर चर्चा की। सर्वसम्मति से यह तय पाया गया कि ब्लॉगरों की संख्या एक करोड़ तक ले जाने के लिये सघन/व्यापक टिप्पणी अभियान जरूरी है। और एक करोड़ ब्लॉगर होने के बाद ही हिन्दी ब्लॉगिंग का कोई आर्थिक पक्ष हो सकेगा।

 

सम्मेलन का उत्तरार्ध, अगर समय निकल पाया तो, लंचोपरान्त होगा। Open-mouthed smile 


अपडेट: लंच के आकार-प्रकार को देखते हुये सर्वसम्मति से सम्मेलन समाप्त मान लिया गया। सोना ज्यादा महत्वपूर्ण समझा गया। वैसे भी मुझे यह मलाल है कि मुझे महान नहीं माना शिवकुमार मिश्र ने! Smile  

गुल्ले; टेम्पो कण्डक्टर


वह तब नहीं था, जब मैं टेम्पो में गोविन्द पुरी में बैठा। डाट की पुलिया के पास करीब पांच सौ मीटर की लम्बाई में सड़क धरती की बजाय चन्द्रमा की जमीन से गुजरती है और जहां हचकोले खाती टेम्पो में हम अपने सिर की खैरियत मनाते हैं कि वह टेम्पो की छत से न जा टकराये, वहीं अचानक वह मुझे टेम्पो चालक की बगल में बैठा दीखा।

GDP1025-001कब टेम्पो धीमे हुयी, कब वह आ कर बैठा, यह चन्द्रकान्ता सन्तति के जमाने का रहस्य लगा। पर वह था। वह इतना दुबला था कि जिस चीज का वह बना था उसे डाक्टरी भाषा में डेढ़ पसली कहते हैं। अपनी काया में वजन वह अपनी आवाज और धाराप्रवाह प्रांजल गालियों से डाल रहा था। यह जरूर है कि उसके कुछ ही शब्द मेरे पल्ले पड़ रहे थे। एक गाली-हिन्दी इंटरप्रेटर की जरूरत मुझे महसूस हो रही थी।

वह था गुल्ले। उम्र कुल बारह-तेरह। पर गुल्ले की उपस्थिति ने टेम्पो यात्रा में जान डाल दी थी। मैं करीब दो दशक बाद टेम्पो पर चढ़ा था। अगर गुल्ले न होता तो मेरे गोविन्द पुरी से कचहरी तक के सफर के पांच रुपये बरबाद जाते!

चालक ने एक मोटी धारदार पीक छोड़ी पान की। इम्प्रेसिव! अगर पीक छोड़ने का खेल कॉमनवेल्थ गेम्स में होता तो शर्तिया उसके सारे मैडल इलाहाबाद के टेम्पो चालक जीतते। एक गगरा (गागर भर) पीक छोड़ते हैं एक बार में। पीक छोड़ उसने गुल्ले को कहा – भो@ड़ीके, तेलियरगंज आ रहा है, पीछे सवारी देख।

चलती टेम्पो में सट्ट से गुल्ले आगे से पीछे पंहुच गया। बाई गॉड की कसम; इस पर बहुत धांसू डॉक्यूमेण्टरी बन सकती है। चार सवारी बैठाईं तेलियर गंज में उसने। एक कालिज की लड़की के बगल में बैठा गुल्ले। लड़की कोने की सीट पर बैठी थी। उसके बाद इस्टेट बैंक के पास एक अधेड़ महिला को एडजस्ट किया उसने अपनी जगह। उसकी छोटी लड़की को महिला की गोद में बिठवाया और खुद बिना किसी समस्या के कालिज वाली लड़की के चरणों में बैठ गया।

एक समय छ सीटर टेम्पो में पन्द्रह लोग बैठे थे। टाटा इण्डिका मुझ इकल्ले को ले कर जाती है! Sad smile 

लॉ ऑफ अबण्डेंस (Law of abundance) का प्रत्यक्ष प्रमाण! गुल्ले को तो प्लानिंग कमीशन में होना चाहिये। भारत में प्रतिभायें यूं ही बरबाद होती है!

अगली टेम्पो यात्रा का संयोग न जाने कब होगा। कब अवसर मिलेगा मुझे!


मुझे लम्बी पोस्ट लिखना नहीं आता, वरना गुल्ले या चालक का सवारी से अपने शरीर के विशिष्ट अंग को खुजलाते हुये बतियाना। सड़क चलते आदमी को हांक लगाना – कहां जाब्ये, अनवस्टी गेट, अनवस्टी गेट (कहां जाओगे, यूनिवर्सिटी गेट, यूनिवर्सिटी गेट)? आदि का वर्णन तो अनिवार्य हैं टेम्पो की पोस्ट पर!

यद्यपि मैं पूरी तरह स्वस्थ महसूस नहीं कर रहा, पर यायावरी का मन है। अपनी यायावरी फ़ेज का प्रारम्भ मैं छोटी सी टेम्पो यात्रा से करना चाहता था। वह पूरी की! और मैं ढूंढ़ लाया गुल्ले को! Smile

अगली यात्रा करछना के गंगा तट की होगी।   


आखरी सुम्मार


मन्दिर को जाने वाली सड़क पर एक (अन)अधिकृत चुंगी बना ली है लुंगाड़ो नें। मन्दिर जाने वालों को नहीं रोकते। आने वाले वाहनों से रोक कर वसूली करते हैं। श्रावण के महीने में चला है यह। आज श्रावण महीने का आखिरी सोमवार है। अब बन्द होने वाली है यह भलेण्टियरी।

आज सवेरे-सवेरे एक स्कूटर सवार को रोका। तीन की टीम है। एक आठ-दस साल का लड़का जो सडक के आर पार की बल्ली उठाता गिराता है; एक रिंगलीडर; और एक उसका असिस्टेण्ट।

स्कूटर के पीछे बैठी महिला वसूली पर बहुत चौंचियायी।

घूमने के बाद वापसी में आते देखा। रिंगलीडर स्टूल पर बैठे थे। पिच्च से थूक कोने में फैंकी। प्रवचे – आज आखरी सुम्मार है बे! आज भो**के पीट पीट कर वसूलना है।

पास में ही बेरोजगारी के खिलाफ ईमानदार अभियान का पोस्टर पुता था दीवार पर! Last Monday


तारेक और मिचेल सलाही


salahi हम ठहरे घोंघा! सेलिब्रिटी बन न पाये तो किसी सेलिब्रिटी से मिलने का मन ही नहीं होता। किसी समारोह में जाने का मन नहीं होता। कितने लोग होंगे जो फलानी चोपड़ा या  ढ़िकानी सावन्त के साथ फोटो खिंचने में खजाना नौछावर कर दें। हम को वह समझ में नहीं आता!

क्या बतायें; सेलियुग (सेलिब्रिटी-युग, कलियुग का लेटेस्ट संस्करण) आ गया है।

मिचेल सलाही ओबामा प्रसाद से हाथ मिला रही है। साथ में उसका पति है तारेक। पता नहीं कौन गदगद है – ओबामा या मिचेल।

पर नाम कमाने का यह गैटक्रैशीय तरीका हमें तो पसन्द न आया। किसी समारोह में कार्ड न मिले और कार्ड पर अपना सिरिनामा न हो तो उस समारोह में झांकने जाना क्या शोभा देता है? आप ही बताइये।


GD at Ganges2 और यह जगह है, जहां जाने को न कोई कार्ड चाहिये, न सिरिनामा। यहां मैं निर्द्वन्द गेटक्रैश करता हूं। यहां भारत के इतिहास में सबसे बड़ी सेलिब्रिटी रहती हैं – गंगाजी।

यह शिवकुटी का घाट है, जहां मेरी टीम कल रविवार को सेवा कर जा चुकी थी। मैं व्यस्त होने के कारण समय पर वहां नहीं था। बाद में देखा तो पाया कि लोगों ने घाट की सफाई और कटान का सीमेण्ट की थैलियों में रेत भर कर पुख्ता इन्तजाम किया था। इन लोगों की प्रतिबद्धता देख सुकून मिलता है।

मेरी पत्नीजी ने समय पर सीमेण्ट की खाली बोरियां और चाय-बिस्कुट भिजवा दिये थे।

गंगाजी का पानी मटमैला भी दीख रहा था और गन्दला भी! :-(