मिश्री पाल की भेड़ें


GDFeb164606-01गड़रिया हैं मिश्री पाल। यहीं पास के गांव पटखौली के हैं। करीब डेढ़ सौ भेड़ें हैं उनके पास। परिवार के तीन लोग दिन भर चराते हैं उनको आसपास।

मुझे मिले कटका रेलवे स्टेशन की पटरियों के पास अपने रेवड़ के साथ। भेड़ें अभी ताजा ऊन निकाली लग रही थीं। हर एक बेतरतीब बुचेड़ी हुई। उन्होने बताया कि साल में तीन बार उतरता है उनका ऊन। इस बार करीब चालीस किलो निकला।

मिश्री पाल ने बताया – बहुत कम दाम मिलते हैं ऊन के। खरीदने वाला 8रुपये किलो खरीद ले जाता है।

यह तो बहुत कम दाम हुये। आलू के भाव। – मैने अपना मत व्यक्त किया।

GDFeb164608-01

“हां, बहुत कम है। पर और कोई काम नहीं। दिन भर चराते हैं। देखभाल करनी पड़ती है।” मिश्री पाल ने कहा कि वे भेड़ें बेचने का धन्धा नहीं करते। पर मुझे लगा कि यह गड़रिये का काम अगर भेड़ें बेचने पर आर्धारित नहीं है तो मात्र ऊन के आधार पर किसी भी प्रकार से सस्टेन नहीं किया जा सकता। गड़रिया के काम में पैसा कहां और किस मद में आता है; मैं यह सोचने में लग गया। 

मिश्री पाल के पास बैल भी हैं। बैलों को वे हल चलाने के लिये किराये पर देते हैं। आजकल किसान बैल नहीं रखते। अगर जोत बहुत छोटी है, या जगह ऐसी, जहां ट्रेक्टर नहीं जा सकता, तो वहां हल का प्रयोग करते हैं। वहां मिश्री पाल के बैल काम आते हैं।

देहात में बहुत से लोग; जिनके पास जमीन नहीं है; भेड़, बकरी, सूअर, गाय, भैंस आदि पाल कर उनके दूध, ऊन, मांस आदि से अपना जीवन यापन करते हैं। उनके रहन सहन को देख कर लगता है कि उन्हें गरीब तो जरूर माना जायेगा; पर आर्थिक आधार पर कम जोत वाले किसानों की अपेक्षा बहुत विपन्न हों – वैसा भी नहीं है। मुझे लगा कि कभी पटखौली जा कर मिश्री पाल का जीवन देखना चाहिये।

कितनी ही अच्छी पुस्तके गड़रियों के घुमन्तू जीवन के आधार पर लिखी गयी हैं। कई देशों और महाद्वीपों में यात्रा करते गड़रिये। मिश्री पाल वैसे तो नहीं हैं; पर छोटे मोटे स्तर पर घुमन्तू तो हैं ही।

मैं मिश्री पाल का चित्र ले चलने लगा। सांझ हो गयी थी। मिश्री पाल भी अपने गांव लौट रहे होंगे अपने रेवड़ के साथ। वे और उनके साथी डण्डा फटकारते हुये, हट्ट-हट्ट की ध्वनि निकालते अपनी भेड़ें साधने में लग गये।

GDFeb164604-01


उमादास


GDFeb164437गुरु द्वारा दिया नाम उमादास। गृहस्थ नाम ॐ प्रकाश शुक्ल। बांसगांव, देवरिया के रहने वाले। कृशकाय शरीर। पर्याप्त स्फूर्ति। साधू।

उमादास नाम गुरु का दिया है। गुरु का नाम भी बताया उन्होने। बनारस के हैं गुरूजी।

चाय की चट्टी पर अचानक दिखे। चट्टी वाले अरुण से मैने उनके बारे में पूछा – कौन हैं?

“होंगे कोई बाबा। आते जाते रहते हैं।” अरुण ने उनके बारे में अनभिज्ञता जताई।  अपने पिताजी के समय से चट्टी पर इस तरह के बाबा लोगों का सत्कार करते रहे हैं अरुण और अन्य भाई लोग। बिना पूछे कि कौन कहां के हैं। मैं अरुण से भी प्रभावित होता हूं और बाबाजी से भी। सरल से जीव लगते हैं बाबा जी। पास के हैण्डपम्प से पानी ले कर खड़े बाबा से बतियाने लगता हूं।

अपना मुकाम पहले गोरखपुर बताते हैं। ज्यादा पूछने पर देवरिया और उसके आगे तिखारने पर बांसगांव। बाईस जनवरी को चले हैं। मईहर तक जा कर लौटेंगे। कुल 125 दिन की यात्रा का अनुमान है। पैदल ही चलते हैं उमादास। रोज लगभग 5 कोस। जहां जगह मिली वहां विश्राम कर लेते हैं और जहां जो भोजन मिला, वही कर लेते हैं। पास में एक कपड़े में रोल किया कम्बल-चद्दर है। एक झोले में अन्य सामान। एक कमण्डल भी है – जो शायद साधू होने का प्रतीक है। अन्यथा उनके पास एक ग्लास भी दिखा, जिसमें पानी पी रहे थे वे।

GDFeb164438

उम्र नहीं पूछी; पर मेरी उम्र के तो होंगे ही। शायद ज्यादा भी। स्वस्थ होने के कारण मुझसे जवान लगते थे।

अपनी अवस्था का अनुमान देते हुये बताते हैं उमादास – “शरीर का क्या भरोसा? अपना पता और तीन चार लोगों का मोबाइल नम्बर अपने झोले में रखा हूं।”

झोले से निकाल कर गीता की प्रति और उसमें लिखे मोबाइल नम्बर/पता आदि दिखाया उन्होने। बोला कि गीता और रामायण साथ में ले कर चलते हैं।

अपना खाना भी बना लेते हैं?

“नहीं, जो मिला वही कर लेता हूं। कभी अगर कुछ न मिला तो दो टिक्कड़् सेंक लेता हूं।”

पहले भी कभी यात्रा की है?

“पन्द्रह साल पहले चित्रकूट तक गया था इसी तरह। अकेले। एक बार मैरवा गया था। पैदल ही। अकेले। नेपाल नहीं गया। पहाड़ नहीं चढा हूं।”

अपनी दशा या देश-काल से कोई शिकायत नहीं लगी उमादास को। प्रसन्नमन ही दिखे। उन्हे मैने चलते समय एक जून के भोजन के पैसे दिये। बडी सहजता से स्वीकार किये उन्होने।

वापसी में अपने साथ चलते राजन भाई से मैने कहा – एक उमानाथ हैं। अगली जून के भोजन की फिक्र नहीं और मैं हूं; जो अगले साल भर के लिये अन्न संग्रह की जुगत में हूं। एक वाहन, एक वाहन ड्राइवर काइन्तजाम कर रहा हूं। मैं असन्तुष्ट हूं। उमानाथ संतुष्ट हैं और प्रसन्न भी।

अपना अपना भाग्य। अपनी अपनी दशा।

GDFeb164442


अविनाश सिरपुरकर : एक दण्ड-अधिवक्ता के पीछे का व्यक्तित्व


श्री अविनाश सिरपुरकर (उनके फेसबुक प्रोफाइल का चित्र)
श्री अविनाश सिरपुरकर (उनके फेसबुक प्रोफाइल का चित्र)

समाचारों में मैं क्रिमिनल लॉयर्स के बारे में बहुत पढ़ता-सुनता रहा हूं। पर पहले किसी क्रिमिनल लॉयर से सम्पर्क नहीं हुआ था। अत: एक कौतूहल तो था मन में कि ये व्यक्ति अपराध, छद्म, और मामलों को सदा एक्यूट एंगल से देखते देखते अपने सामान्य व्यक्तित्व, आदर्श और नैतिकता को किस स्तर का बनाये रखते हैं। यह इच्छा मन में थी कि अगर ऐसे किसी व्यक्ति से कभी मिला तो इस बारे में पूछूंगा जरूर।

मुझे अवसर मिल गया जब मैं उस दिन अपने काम से श्री अविनाश सिरपुरकर से उनके इन्दौर के दफ्तर में मिला। उनसे इस विषय में टेनटेटिव प्रश्न किया। पर अविनाश जी ने सम्भवत: इसे मूल विषय से इतर मान कर यही समझा कि मैं उनसे नेटवर्किंग बनाने के लिये इस प्रकार का प्रश्न कर रहा हूं। वह बात वहीं रह गयी।

अविनाश जी से अगले दिन पुन: मुलाकात हुई। रतलाम में। तब उन्होने स्वयम अपने विषय में (लगभग) विस्तार से बताया।

अविनाश मध्य प्रदेश हाई-कोर्ट के वरिष्ठ दण्ड-अधिवक्ता (क्रिमिनल लॉयर) हैं। वरिष्ठ और व्यस्त। “मेरी सात पीढ़ियां अधिवक्ताओं/कोर्ट-कचहरी वालों की हैं।” उनकी मानी जाये तो कानून-कोर्ट-कचहरी-अदालत केन्द्रित है उनका जीवन। “उसके अलावा कुछ नहीं”

मैं असहमति जताता हूं। एक व्यक्ति जो सफलता के सोपान तय कर के (लगभग) शीर्ष पर पंहुचता है, एकांगी नहीं हो सकता। किसी न किसी अन्य प्रकार से समाज के प्रति अपना दायित्व समझता होगा – अगर वह मात्र आत्मकेन्द्रित/स्वार्थपरायणी न हो। और एक इण्ट्रोवर्ट व्यक्ति के भी उत्कृष्टता के एक से अधिक पहलू होते हैं।

स्टीफन आर कोवी की पुस्तक – द एड्थ हैबिट ( THE 8TH HABIT: FROM EFFECTIVENESS TO GREATNESS) पढ़ते समय मुझे यह गहरे से महसूस हुआ था कि सफल व्यक्ति केवल सफलता पर ही ठहरता नहीं है। उसमें समाज और जीवन को प्रतिदान (contribution) करने,  मूल्य (values) देने, और लीगेसी स्थापित करने की अंतर्निहित इच्छा होती है। यह मानव का मूल स्वभाव है।

अविनाश जी का फेसबुक कवर
अविनाश जी का फेसबुक कवर

इस बारे में अविनाश जी काफी झिझकते हुये खुले। मुझ जैसे लगभग अपरिचित से खुलने में होने वाली झिझक स्वाभाविक है। शुरुआत उन्होने अपने घर के पास एक मन्दिर बनाने की बात से की। मैं धार्मिकता का पहलू समझ सकता हूं। उनके फेसबुक प्रोफाइल के कवर पर गजानन महाराज का चित्र है। उन्होने बातचीत में शेगांव (वह स्थान जहां गजानन महाराज प्रकट हुये) की चर्चा भी की।

इसके बाद उन्होने जिस बात की चर्चा की, वह प्रसन्न कर देने वाली थी। अपने किसी मित्र ‘व्यास जी’ के कहे अनुसार वे सन 2003 से प्रतिवर्ष इंजीनियरिंग/डाक्टरी के कुछ विद्यार्थियों की शिक्षा का खर्च वहन करते हैं। उसमें विद्यार्थी के साथ तय यही होता है कि पढ़ाई के बाद समर्थवान हो कर वह भी इसी प्रकार दूसरों की पढ़ाई में सहयोग करेगा।

“क्या वे बाद में ऐसा करते हैं?”

“जी हां।”

मुझे अच्छा लगा यह जानकर कि इस तरह अविनाश जी विद्यादान की चेन कायम कर रहे हैं।

आगे स्वत: बताया उन्होने – “वकालत में सफलता के कारण मुझे पैसे की समस्या नहीं है। मेरा विचार है कि पचपन की अवस्था तक वकालत करूंगा। उसके बाद आदिवासियों के बीच काम करने का मन है।”

“अच्छा! क्या तय कर लिया है कि कहां और किस प्रकार कार्य करेंगे?”

अविनाश जी ने झाबुआ क्षेत्र की बात की। रतलाम रेल मण्डल में लम्बे अर्से तक कर्य करते हुये मुझे झाबुआ के आदिवासियों की विपन्नता के बारे में अनुभूति है। अनेक आदिवासी लोगों के चेहरे मेरी स्मृति में हैं। वनवासी कल्याण की जरूरतों के बारे में बहुत लोगों से सुना है। अत: यह जान कर बहुत अच्छा लगा।

मैने अविनाश जी से अपनी भी कही – आने वाले समय में गांव और गंगा नदी के सामीप्य में रहने की बात। उन्होने कहा – अच्छा है। आपके पास गंगा हैं और मेरे समीप हैं नर्मदा!

बातचीत के प्रारम्भ में मैं एक क्रिमिनल लॉयर के समक्ष था। एक ऐसा व्यक्ति जो सामने वाले को अपने तर्क, सूचना और वाकपटुता से हतप्रभ और निष्प्रभावी करने में दक्ष होता है। जिस क्रिमिनल लॉयर का यह ‘आवरण’ जितना कठोर और इम्प्रेगनेबल होता है, वह (मेरे अनुमान से) अपने पेशे में उतना कुशल होता है। पर बातचीत समाप्त कर हाथ मिलाते हुये मैं उस आवरण के पीछे के एक संवेदनशील और समाज के प्रति जिम्मेदार व्यक्ति से परिचय पा चुका था। एक सज्जन और एक उत्कृष्ट व्यक्ति से परिचय पाना किसे अच्छा नहीं लगता?

मैं वास्तव में प्रसन्न था। भविष्य में अगर अविनाश जी से सम्पर्क बना रहा तो उनके झाबुआ अदिवासियों के कल्याण कार्यों के बारे में जानने की इच्छा रहेगी!


खरमोर


रतलाम; बाईस अगस्त’ 2015

सैलाना बर्ड सेंक्चुरी के सब डिवीजनल अफसर श्री भगवती पवार मेरे पास बैठे थे। मैं उनसे खरमोर देखने के उपक्रम के लिये चर्चा कर रहा था। उज्जैन सम्भाग के चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट, श्री प्रवीण चन्द्र दुबे जी ने पवार जी को सहेज दिया था कि वे मेरी सहायता कर दें। और पवार जी अत्यंत सहायक थे प्रबन्ध करने में।

उछाल लेता खरमोर पक्षी।
उछाल लेता खरमोर पक्षी।

खरमोर एक प्रवासी पक्षी है। जुलाई से सितम्बर के बीच यह सैलाना के शिकारबाड़ी क्षेत्र में आता है। यह उत्तरोत्तर दुर्लभ होता जा रहा है। पिछले साल एक दर्जन के आस्पास ये पक्षी दिखे थे सैलाना में। इस साल चार-पांच दिखे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में 23 जुलाई को छपा था कि श्री भगवती पवार ने बताया – “कल चौकीदार के माध्यम से खबर मिली कि सवेरे दस बजे खरमोर दिखा। उसके बाद मैने भी जा कर खरमोर का जोड़ा देखा।”

मानसून का समय खरमोर के प्रजनन का समय है। मादा को आकर्षित करने और प्रभावित करने के लिये खरमोर मोर की तरह नृत्य नहीं करता; वह ऊंची ऊंची छलांग भरता है। करीब 6-8 फिट ऊंची छलांग। और दिन भर में 8-10 बार नहीं; लगभग 500-600 बार। उसका छलांग लगाना दर्शनीय है। यह देखने के लिये सैलानी और ऑर्निथोलॉजिस्ट आते हैं।

पवार जी ने बताया कि सवेरे 6-8 बजे के बीच वह दिखता है। दिन में घास और झाड़ियों के बीच छिपा रहता है। शाम चार बजे के बाद दिखता है। पर देखने का उचित समय सवेरे ही है।

यह तय हुआ कि हम सवेरे छ बजे निकल लेंगे सैलाना के लिये। साथ में भगवती पवार जी के एक सहायक हमारे साथ रहेंगे।

रतलाम; 23 अगस्त’2015

श्री मनोज गौड़। खरमोर दिखाने में सहायक बने वे।
श्री मनोज गौड़। खरमोर दिखाने में सहायक बने वे।

सवेरे छ बजे पवार जी के सहायक श्री मनोज गौड़ हमारे रेस्ट हाउस आ गये। पांच मिनट में हम लोग चल पड़े। सैलाना की सड़क बहुत अच्छी थी (मुझे लगभग 15-20 साल पहले का स्मरण है जब सड़क पर बड़े गड्ढे हुआ करते थे। पर तब माननीय दिग्विजय सिंह जी का मुख्यमंत्रित्व काल हुआ करता था, शायद)। हम जल्दी ही सेंक्चुरी में पंहुच गये। वहां कुछ वाहन पहले भी खड़े थे। लोग खरमोर देखने के उपक्रम में पहले से ही सन्नध थे।

श्री भीमा और अन्य सैलाना बर्ड सेंक्चुरी के कर्मी।
श्री भीमा और अन्य सैलाना बर्ड सेंक्चुरी के कर्मी।

हमें फॉरेस्ट गार्ड भीमा और उनके साथ अन्य चार-पांच कर्मियों ने बाइनाक्यूलर्स दिये देखने को। यह भी बताया कि ‘उस’ ओर जो झोंपड़िया सी दिख रही हैं, उसके पास है खरमोर। उसे पहचान कर स्थिति साधने में कुछ समय लगा। उसके बाद कई बार खरमोर को उछलते देखा। खरमोर बगुले से बड़े और मोर से छोटे आकार का पक्षी है। उसकी चाल में ग्रेस है और उसकी लगभग ऊर्ध्वाकार छलांग तो गजब ही है। ऐसा किसी अन्य पक्षी को करते नहीं देखा।


इस वीडियो में खरमोर नर पक्षी झाड़ियों में कहीं बैठी मादा को आकर्षित करने के लिये ऊंची-ऊंची छलांगें लगा रहा है।

खरमोर - The Lesser Florican का जॉन गोल्ड (1804-1881) का पब्लिक डोमेन में उपलब्ध एक चित्र।
खरमोर – The Lesser Florican का जॉन गोल्ड (1804-1881) का पब्लिक डोमेन में उपलब्ध एक चित्र।

यह बताया गया कि जो झोंपड़ियां हैं, उसमें लोग भोर से बैठे हैं खरमोर को नजदीक से देखने की साधना करते हुये। पक्षी अवलोकन एक कष्ट-साध्य कार्य है।

लगभग 30-40 मिनट वहां व्यतीत कर हम लोग वापस लौटने लगे। वापसी में एक वाहन के पास आदित्य और नियति मिले। खरमोर के प्रेमी हैं ये दोनो। अहमदाबाद के रहने वाले। इन्दौर में काम से आते हैं। वहां से रतलाम/सैलाना आना नहीं भूलते। खरमोर की सेंक्चुरी धार में भी है, पर यहां आते हैं वे “चूंकि यहां खरमोर बेहतर दिखता है”।

नियति और आदित्य।
नियति और आदित्य।

हम लोग तो शौकिया आये – प्रवीण चन्द्र दुबे जी से परिचय की मार्फत। पर आदित्य और नियति जैसे लोग तो वास्तव में उत्साही जीव हैं, जो बर्ड-वाचिंग की हॉबी को गम्भीरता से लेते हैं और उसके लिये समय, धन और श्रम खर्च करते हैं। … ईश्वर ऐसा जुनून हमें भी दें।

(इस पोस्ट के खरमोर के चित्र और वीडियो श्री भगवती पवार के सौजन्य से)

छलांग लेता खरमौर।
छलांग लेता खरमौर।